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Shri Ramcharit Manas (श्री राम चरित मानस) अयोध्याकाण्ड (Ayodhyakand)

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Ram Vandana (राम वन्दना)

राम वंदना भगवान राम (Lord Rama), जिन्हें "Maryada Purushottam" और "embodiment of dharma" कहा जाता है, की महिमा का वर्णन करती है। यह वंदना उनके "ideal character," "divine leadership," और "symbol of righteousness" को उजागर करती है। श्रीराम भक्तों को "spiritual guidance," "inner peace," और "moral strength" प्रदान करते हैं। राम वंदना का पाठ जीवन में "harmony," "prosperity," और "divine blessings" लाने का मार्ग है।
Vandana

Shri Ram Charit Manas (श्री राम चरित मानस) अरण्यकाण्ड(Aranyakanda)

श्री राम चरित मानस (Shri Ram Charit Manas) श्री राम चरित मानस - अरण्यकाण्ड श्री गणेशाय नमः श्री जानकीवल्लभो विजयते श्री रामचरितमानस तृतीय सोपान (अरण्यकाण्ड) मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधेः पूर्णेन्दुमानन्ददं वैराग्याम्बुजभास्करं ह्यघघनध्वान्तापहं तापहम्। मोहाम्भोधरपूगपाटनविधौ स्वःसम्भवं शङ्करं वन्दे ब्रह्मकुलं कलङ्कशमनं श्रीरामभूपप्रियम् ॥ 1 ॥ सान्द्रानन्दपयोदसौभगतनुं पीताम्बरं सुन्दरं पाणौ बाणशरासनं कटिलसत्तूणीरभारं वरम् राजीवायतलोचनं धृतजटाजूटेन संशोभितं सीतालक्ष्मणसंयुतं पथिगतं रामाभिरामं भजे ॥ 2 ॥ सो. उमा राम गुन गूढ़ पण्डित मुनि पावहिं बिरति। पावहिं मोह बिमूढ़ जे हरि बिमुख न धर्म रति ॥ पुर नर भरत प्रीति मैं गाई। मति अनुरूप अनूप सुहाई ॥ अब प्रभु चरित सुनहु अति पावन। करत जे बन सुर नर मुनि भावन ॥ एक बार चुनि कुसुम सुहाए। निज कर भूषन राम बनाए ॥ सीतहि पहिराए प्रभु सादर। बैठे फटिक सिला पर सुन्दर ॥ सुरपति सुत धरि बायस बेषा। सठ चाहत रघुपति बल देखा ॥ जिमि पिपीलिका सागर थाहा। महा मन्दमति पावन चाहा ॥ सीता चरन चौञ्च हति भागा। मूढ़ मन्दमति कारन कागा ॥ चला रुधिर रघुनायक जाना। सीङ्क धनुष सायक सन्धाना ॥ दो. अति कृपाल रघुनायक सदा दीन पर नेह। ता सन आइ कीन्ह छलु मूरख अवगुन गेह ॥ 1 ॥ प्रेरित मन्त्र ब्रह्मसर धावा। चला भाजि बायस भय पावा ॥ धरि निज रुप गयु पितु पाहीं। राम बिमुख राखा तेहि नाहीम् ॥ भा निरास उपजी मन त्रासा। जथा चक्र भय रिषि दुर्बासा ॥ ब्रह्मधाम सिवपुर सब लोका। फिरा श्रमित ब्याकुल भय सोका ॥ काहूँ बैठन कहा न ओही। राखि को सकि राम कर द्रोही ॥ मातु मृत्यु पितु समन समाना। सुधा होइ बिष सुनु हरिजाना ॥ मित्र करि सत रिपु कै करनी। ता कहँ बिबुधनदी बैतरनी ॥ सब जगु ताहि अनलहु ते ताता। जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता ॥ नारद देखा बिकल जयन्ता। लागि दया कोमल चित सन्ता ॥ पठवा तुरत राम पहिं ताही। कहेसि पुकारि प्रनत हित पाही ॥ आतुर सभय गहेसि पद जाई। त्राहि त्राहि दयाल रघुराई ॥ अतुलित बल अतुलित प्रभुताई। मैं मतिमन्द जानि नहिं पाई ॥ निज कृत कर्म जनित फल पायुँ। अब प्रभु पाहि सरन तकि आयुँ ॥ सुनि कृपाल अति आरत बानी। एकनयन करि तजा भवानी ॥ सो. कीन्ह मोह बस द्रोह जद्यपि तेहि कर बध उचित। प्रभु छाड़एउ करि छोह को कृपाल रघुबीर सम ॥ 2 ॥ रघुपति चित्रकूट बसि नाना। चरित किए श्रुति सुधा समाना ॥ बहुरि राम अस मन अनुमाना। होइहि भीर सबहिं मोहि जाना ॥ सकल मुनिन्ह सन बिदा कराई। सीता सहित चले द्वौ भाई ॥ अत्रि के आश्रम जब प्रभु गयू। सुनत महामुनि हरषित भयू ॥ पुलकित गात अत्रि उठि धाए। देखि रामु आतुर चलि आए ॥ करत दण्डवत मुनि उर लाए। प्रेम बारि द्वौ जन अन्हवाए ॥ देखि राम छबि नयन जुड़आने। सादर निज आश्रम तब आने ॥ करि पूजा कहि बचन सुहाए। दिए मूल फल प्रभु मन भाए ॥ सो. प्रभु आसन आसीन भरि लोचन सोभा निरखि। मुनिबर परम प्रबीन जोरि पानि अस्तुति करत ॥ 3 ॥ छं. नमामि भक्त वत्सलं। कृपालु शील कोमलम् ॥ भजामि ते पदाम्बुजं। अकामिनां स्वधामदम् ॥ निकाम श्याम सुन्दरं। भवाम्बुनाथ मन्दरम् ॥ प्रफुल्ल कञ्ज लोचनं। मदादि दोष मोचनम् ॥ प्रलम्ब बाहु विक्रमं। प्रभोऽप्रमेय वैभवम् ॥ निषङ्ग चाप सायकं। धरं त्रिलोक नायकम् ॥ दिनेश वंश मण्डनं। महेश चाप खण्डनम् ॥ मुनीन्द्र सन्त रञ्जनं। सुरारि वृन्द भञ्जनम् ॥ मनोज वैरि वन्दितं। अजादि देव सेवितम् ॥ विशुद्ध बोध विग्रहं। समस्त दूषणापहम् ॥ नमामि इन्दिरा पतिं। सुखाकरं सतां गतिम् ॥ भजे सशक्ति सानुजं। शची पतिं प्रियानुजम् ॥ त्वदङ्घ्रि मूल ये नराः। भजन्ति हीन मत्सरा ॥ पतन्ति नो भवार्णवे। वितर्क वीचि सङ्कुले ॥ विविक्त वासिनः सदा। भजन्ति मुक्तये मुदा ॥ निरस्य इन्द्रियादिकं। प्रयान्ति ते गतिं स्वकम् ॥ तमेकमभ्दुतं प्रभुं। निरीहमीश्वरं विभुम् ॥ जगद्गुरुं च शाश्वतं। तुरीयमेव केवलम् ॥ भजामि भाव वल्लभं। कुयोगिनां सुदुर्लभम् ॥ स्वभक्त कल्प पादपं। समं सुसेव्यमन्वहम् ॥ अनूप रूप भूपतिं। नतोऽहमुर्विजा पतिम् ॥ प्रसीद मे नमामि ते। पदाब्ज भक्ति देहि मे ॥ पठन्ति ये स्तवं इदं। नरादरेण ते पदम् ॥ व्रजन्ति नात्र संशयं। त्वदीय भक्ति संयुता ॥ दो. बिनती करि मुनि नाइ सिरु कह कर जोरि बहोरि। चरन सरोरुह नाथ जनि कबहुँ तजै मति मोरि ॥ 4 ॥ श्री गणेशाय नमः श्री जानकीवल्लभो विजयते श्री रामचरितमानस ---------- तृतीय सोपान (अरण्यकाण्ड) श्लोक मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधेः पूर्णेन्दुमानन्ददं वैराग्याम्बुजभास्करं ह्यघघनध्वान्तापहं तापहम्। मोहाम्भोधरपूगपाटनविधौ स्वःसम्भवं शङ्करं वन्दे ब्रह्मकुलं कलङ्कशमनं श्रीरामभूपप्रियम् ॥ 1 ॥ सान्द्रानन्दपयोदसौभगतनुं पीताम्बरं सुन्दरं पाणौ बाणशरासनं कटिलसत्तूणीरभारं वरम् राजीवायतलोचनं धृतजटाजूटेन संशोभितं सीतालक्ष्मणसंयुतं पथिगतं रामाभिरामं भजे ॥ 2 ॥ सो. उमा राम गुन गूढ़ पण्डित मुनि पावहिं बिरति। पावहिं मोह बिमूढ़ जे हरि बिमुख न धर्म रति ॥ पुर नर भरत प्रीति मैं गाई। मति अनुरूप अनूप सुहाई ॥ अब प्रभु चरित सुनहु अति पावन। करत जे बन सुर नर मुनि भावन ॥ एक बार चुनि कुसुम सुहाए। निज कर भूषन राम बनाए ॥ सीतहि पहिराए प्रभु सादर। बैठे फटिक सिला पर सुन्दर ॥ सुरपति सुत धरि बायस बेषा। सठ चाहत रघुपति बल देखा ॥ जिमि पिपीलिका सागर थाहा। महा मन्दमति पावन चाहा ॥ सीता चरन चौञ्च हति भागा। मूढ़ मन्दमति कारन कागा ॥ चला रुधिर रघुनायक जाना। सीङ्क धनुष सायक सन्धाना ॥ दो. अति कृपाल रघुनायक सदा दीन पर नेह। ता सन आइ कीन्ह छलु मूरख अवगुन गेह ॥ 1 ॥ प्रेरित मन्त्र ब्रह्मसर धावा। चला भाजि बायस भय पावा ॥ धरि निज रुप गयु पितु पाहीं। राम बिमुख राखा तेहि नाहीम् ॥ भा निरास उपजी मन त्रासा। जथा चक्र भय रिषि दुर्बासा ॥ ब्रह्मधाम सिवपुर सब लोका। फिरा श्रमित ब्याकुल भय सोका ॥ काहूँ बैठन कहा न ओही। राखि को सकि राम कर द्रोही ॥ मातु मृत्यु पितु समन समाना। सुधा होइ बिष सुनु हरिजाना ॥ मित्र करि सत रिपु कै करनी। ता कहँ बिबुधनदी बैतरनी ॥ सब जगु ताहि अनलहु ते ताता। जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता ॥ नारद देखा बिकल जयन्ता। लागि दया कोमल चित सन्ता ॥ पठवा तुरत राम पहिं ताही। कहेसि पुकारि प्रनत हित पाही ॥ आतुर सभय गहेसि पद जाई। त्राहि त्राहि दयाल रघुराई ॥ अतुलित बल अतुलित प्रभुताई। मैं मतिमन्द जानि नहिं पाई ॥ निज कृत कर्म जनित फल पायुँ। अब प्रभु पाहि सरन तकि आयुँ ॥ सुनि कृपाल अति आरत बानी। एकनयन करि तजा भवानी ॥ सो. कीन्ह मोह बस द्रोह जद्यपि तेहि कर बध उचित। प्रभु छाड़एउ करि छोह को कृपाल रघुबीर सम ॥ 2 ॥ रघुपति चित्रकूट बसि नाना। चरित किए श्रुति सुधा समाना ॥ बहुरि राम अस मन अनुमाना। होइहि भीर सबहिं मोहि जाना ॥ सकल मुनिन्ह सन बिदा कराई। सीता सहित चले द्वौ भाई ॥ अत्रि के आश्रम जब प्रभु गयू। सुनत महामुनि हरषित भयू ॥ पुलकित गात अत्रि उठि धाए। देखि रामु आतुर चलि आए ॥ करत दण्डवत मुनि उर लाए। प्रेम बारि द्वौ जन अन्हवाए ॥ देखि राम छबि नयन जुड़आने। सादर निज आश्रम तब आने ॥ करि पूजा कहि बचन सुहाए। दिए मूल फल प्रभु मन भाए ॥ सो. प्रभु आसन आसीन भरि लोचन सोभा निरखि। मुनिबर परम प्रबीन जोरि पानि अस्तुति करत ॥ 3 ॥ छं. नमामि भक्त वत्सलं। कृपालु शील कोमलम् ॥ भजामि ते पदाम्बुजं। अकामिनां स्वधामदम् ॥ निकाम श्याम सुन्दरं। भवाम्बुनाथ मन्दरम् ॥ प्रफुल्ल कञ्ज लोचनं। मदादि दोष मोचनम् ॥ प्रलम्ब बाहु विक्रमं। प्रभोऽप्रमेय वैभवम् ॥ निषङ्ग चाप सायकं। धरं त्रिलोक नायकम् ॥ दिनेश वंश मण्डनं। महेश चाप खण्डनम् ॥ मुनीन्द्र सन्त रञ्जनं। सुरारि वृन्द भञ्जनम् ॥ मनोज वैरि वन्दितं। अजादि देव सेवितम् ॥ विशुद्ध बोध विग्रहं। समस्त दूषणापहम् ॥ नमामि इन्दिरा पतिं। सुखाकरं सतां गतिम् ॥ भजे सशक्ति सानुजं। शची पतिं प्रियानुजम् ॥ त्वदङ्घ्रि मूल ये नराः। भजन्ति हीन मत्सरा ॥ पतन्ति नो भवार्णवे। वितर्क वीचि सङ्कुले ॥ विविक्त वासिनः सदा। भजन्ति मुक्तये मुदा ॥ निरस्य इन्द्रियादिकं। प्रयान्ति ते गतिं स्वकम् ॥ तमेकमभ्दुतं प्रभुं। निरीहमीश्वरं विभुम् ॥ जगद्गुरुं च शाश्वतं। तुरीयमेव केवलम् ॥ भजामि भाव वल्लभं। कुयोगिनां सुदुर्लभम् ॥ स्वभक्त कल्प पादपं। समं सुसेव्यमन्वहम् ॥ अनूप रूप भूपतिं। नतोऽहमुर्विजा पतिम् ॥ प्रसीद मे नमामि ते। पदाब्ज भक्ति देहि मे ॥ पठन्ति ये स्तवं इदं। नरादरेण ते पदम् ॥ व्रजन्ति नात्र संशयं। त्वदीय भक्ति संयुता ॥ दो. बिनती करि मुनि नाइ सिरु कह कर जोरि बहोरि। चरन सरोरुह नाथ जनि कबहुँ तजै मति मोरि ॥ 4 ॥ अनुसुइया के पद गहि सीता। मिली बहोरि सुसील बिनीता ॥ रिषिपतिनी मन सुख अधिकाई। आसिष देइ निकट बैठाई ॥ दिब्य बसन भूषन पहिराए। जे नित नूतन अमल सुहाए ॥ कह रिषिबधू सरस मृदु बानी। नारिधर्म कछु ब्याज बखानी ॥ मातु पिता भ्राता हितकारी। मितप्रद सब सुनु राजकुमारी ॥ अमित दानि भर्ता बयदेही। अधम सो नारि जो सेव न तेही ॥ धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी ॥ बृद्ध रोगबस जड़ धनहीना। अधं बधिर क्रोधी अति दीना ॥ ऐसेहु पति कर किएँ अपमाना। नारि पाव जमपुर दुख नाना ॥ एकि धर्म एक ब्रत नेमा। कायँ बचन मन पति पद प्रेमा ॥ जग पति ब्रता चारि बिधि अहहिं। बेद पुरान सन्त सब कहहिम् ॥ उत्तम के अस बस मन माहीं। सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीम् ॥ मध्यम परपति देखि कैसें। भ्राता पिता पुत्र निज जैंसेम् ॥ धर्म बिचारि समुझि कुल रही। सो निकिष्ट त्रिय श्रुति अस कही ॥ बिनु अवसर भय तें रह जोई। जानेहु अधम नारि जग सोई ॥ पति बञ्चक परपति रति करी। रौरव नरक कल्प सत परी ॥ छन सुख लागि जनम सत कोटि। दुख न समुझ तेहि सम को खोटी ॥ बिनु श्रम नारि परम गति लही। पतिब्रत धर्म छाड़इ छल गही ॥ पति प्रतिकुल जनम जहँ जाई। बिधवा होई पाई तरुनाई ॥ सो. सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहि। जसु गावत श्रुति चारि अजहु तुलसिका हरिहि प्रिय ॥ 5क ॥ सनु सीता तव नाम सुमिर नारि पतिब्रत करहि। तोहि प्रानप्रिय राम कहिउँ कथा संसार हित ॥ 5ख ॥ सुनि जानकीं परम सुखु पावा। सादर तासु चरन सिरु नावा ॥ तब मुनि सन कह कृपानिधाना। आयसु होइ जाउँ बन आना ॥ सन्तत मो पर कृपा करेहू। सेवक जानि तजेहु जनि नेहू ॥ धर्म धुरन्धर प्रभु कै बानी। सुनि सप्रेम बोले मुनि ग्यानी ॥ जासु कृपा अज सिव सनकादी। चहत सकल परमारथ बादी ॥ ते तुम्ह राम अकाम पिआरे। दीन बन्धु मृदु बचन उचारे ॥ अब जानी मैं श्री चतुराई। भजी तुम्हहि सब देव बिहाई ॥ जेहि समान अतिसय नहिं कोई। ता कर सील कस न अस होई ॥ केहि बिधि कहौं जाहु अब स्वामी। कहहु नाथ तुम्ह अन्तरजामी ॥ अस कहि प्रभु बिलोकि मुनि धीरा। लोचन जल बह पुलक सरीरा ॥ छं. तन पुलक निर्भर प्रेम पुरन नयन मुख पङ्कज दिए। मन ग्यान गुन गोतीत प्रभु मैं दीख जप तप का किए ॥ जप जोग धर्म समूह तें नर भगति अनुपम पावी। रधुबीर चरित पुनीत निसि दिन दास तुलसी गावी ॥ दो. कलिमल समन दमन मन राम सुजस सुखमूल। सादर सुनहि जे तिन्ह पर राम रहहिं अनुकूल ॥ 6(क) ॥ सो. कठिन काल मल कोस धर्म न ग्यान न जोग जप। परिहरि सकल भरोस रामहि भजहिं ते चतुर नर ॥ 6(ख) ॥ मुनि पद कमल नाइ करि सीसा। चले बनहि सुर नर मुनि ईसा ॥ आगे राम अनुज पुनि पाछें। मुनि बर बेष बने अति काछेम् ॥ उमय बीच श्री सोहि कैसी। ब्रह्म जीव बिच माया जैसी ॥ सरिता बन गिरि अवघट घाटा। पति पहिचानी देहिं बर बाटा ॥ जहँ जहँ जाहि देव रघुराया। करहिं मेध तहँ तहँ नभ छाया ॥ मिला असुर बिराध मग जाता। आवतहीं रघुवीर निपाता ॥ तुरतहिं रुचिर रूप तेहिं पावा। देखि दुखी निज धाम पठावा ॥ पुनि आए जहँ मुनि सरभङ्गा। सुन्दर अनुज जानकी सङ्गा ॥ दो. देखी राम मुख पङ्कज मुनिबर लोचन भृङ्ग। सादर पान करत अति धन्य जन्म सरभङ्ग ॥ 7 ॥ कह मुनि सुनु रघुबीर कृपाला। सङ्कर मानस राजमराला ॥ जात रहेउँ बिरञ्चि के धामा। सुनेउँ श्रवन बन ऐहहिं रामा ॥ चितवत पन्थ रहेउँ दिन राती। अब प्रभु देखि जुड़आनी छाती ॥ नाथ सकल साधन मैं हीना। कीन्ही कृपा जानि जन दीना ॥ सो कछु देव न मोहि निहोरा। निज पन राखेउ जन मन चोरा ॥ तब लगि रहहु दीन हित लागी। जब लगि मिलौं तुम्हहि तनु त्यागी ॥ जोग जग्य जप तप ब्रत कीन्हा। प्रभु कहँ देइ भगति बर लीन्हा ॥ एहि बिधि सर रचि मुनि सरभङ्गा। बैठे हृदयँ छाड़इ सब सङ्गा ॥ दो. सीता अनुज समेत प्रभु नील जलद तनु स्याम। मम हियँ बसहु निरन्तर सगुनरुप श्रीराम ॥ 8 ॥ अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। राम कृपाँ बैकुण्ठ सिधारा ॥ ताते मुनि हरि लीन न भयू। प्रथमहिं भेद भगति बर लयू ॥ रिषि निकाय मुनिबर गति देखि। सुखी भे निज हृदयँ बिसेषी ॥ अस्तुति करहिं सकल मुनि बृन्दा। जयति प्रनत हित करुना कन्दा ॥ पुनि रघुनाथ चले बन आगे। मुनिबर बृन्द बिपुल सँग लागे ॥ अस्थि समूह देखि रघुराया। पूछी मुनिन्ह लागि अति दाया ॥ जानतहुँ पूछिअ कस स्वामी। सबदरसी तुम्ह अन्तरजामी ॥ निसिचर निकर सकल मुनि खाए। सुनि रघुबीर नयन जल छाए ॥ दो. निसिचर हीन करुँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह। सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह ॥ 9 ॥ मुनि अगस्ति कर सिष्य सुजाना। नाम सुतीछन रति भगवाना ॥ मन क्रम बचन राम पद सेवक। सपनेहुँ आन भरोस न देवक ॥ प्रभु आगवनु श्रवन सुनि पावा। करत मनोरथ आतुर धावा ॥ हे बिधि दीनबन्धु रघुराया। मो से सठ पर करिहहिं दाया ॥ सहित अनुज मोहि राम गोसाई। मिलिहहिं निज सेवक की नाई ॥ मोरे जियँ भरोस दृढ़ नाहीं। भगति बिरति न ग्यान मन माहीम् ॥ नहिं सतसङ्ग जोग जप जागा। नहिं दृढ़ चरन कमल अनुरागा ॥ एक बानि करुनानिधान की। सो प्रिय जाकें गति न आन की ॥ होइहैं सुफल आजु मम लोचन। देखि बदन पङ्कज भव मोचन ॥ निर्भर प्रेम मगन मुनि ग्यानी। कहि न जाइ सो दसा भवानी ॥ दिसि अरु बिदिसि पन्थ नहिं सूझा। को मैं चलेउँ कहाँ नहिं बूझा ॥ कबहुँक फिरि पाछें पुनि जाई। कबहुँक नृत्य करि गुन गाई ॥ अबिरल प्रेम भगति मुनि पाई। प्रभु देखैं तरु ओट लुकाई ॥ अतिसय प्रीति देखि रघुबीरा। प्रगटे हृदयँ हरन भव भीरा ॥ मुनि मग माझ अचल होइ बैसा। पुलक सरीर पनस फल जैसा ॥ तब रघुनाथ निकट चलि आए। देखि दसा निज जन मन भाए ॥ मुनिहि राम बहु भाँति जगावा। जाग न ध्यानजनित सुख पावा ॥ भूप रूप तब राम दुरावा। हृदयँ चतुर्भुज रूप देखावा ॥ मुनि अकुलाइ उठा तब कैसें। बिकल हीन मनि फनि बर जैसेम् ॥ आगें देखि राम तन स्यामा। सीता अनुज सहित सुख धामा ॥ परेउ लकुट इव चरनन्हि लागी। प्रेम मगन मुनिबर बड़भागी ॥ भुज बिसाल गहि लिए उठाई। परम प्रीति राखे उर लाई ॥ मुनिहि मिलत अस सोह कृपाला। कनक तरुहि जनु भेण्ट तमाला ॥ राम बदनु बिलोक मुनि ठाढ़आ। मानहुँ चित्र माझ लिखि काढ़आ ॥ दो. तब मुनि हृदयँ धीर धीर गहि पद बारहिं बार। निज आश्रम प्रभु आनि करि पूजा बिबिध प्रकार ॥ 10 ॥ कह मुनि प्रभु सुनु बिनती मोरी। अस्तुति करौं कवन बिधि तोरी ॥ महिमा अमित मोरि मति थोरी। रबि सन्मुख खद्योत अँजोरी ॥ श्याम तामरस दाम शरीरं। जटा मुकुट परिधन मुनिचीरम् ॥ पाणि चाप शर कटि तूणीरं। नौमि निरन्तर श्रीरघुवीरम् ॥ मोह विपिन घन दहन कृशानुः। सन्त सरोरुह कानन भानुः ॥ निशिचर करि वरूथ मृगराजः। त्रातु सदा नो भव खग बाजः ॥ अरुण नयन राजीव सुवेशं। सीता नयन चकोर निशेशम् ॥ हर ह्रदि मानस बाल मरालं। नौमि राम उर बाहु विशालम् ॥ संशय सर्प ग्रसन उरगादः। शमन सुकर्कश तर्क विषादः ॥ भव भञ्जन रञ्जन सुर यूथः। त्रातु सदा नो कृपा वरूथः ॥ निर्गुण सगुण विषम सम रूपं। ज्ञान गिरा गोतीतमनूपम् ॥ अमलमखिलमनवद्यमपारं। नौमि राम भञ्जन महि भारम् ॥ भक्त कल्पपादप आरामः। तर्जन क्रोध लोभ मद कामः ॥ अति नागर भव सागर सेतुः। त्रातु सदा दिनकर कुल केतुः ॥ अतुलित भुज प्रताप बल धामः। कलि मल विपुल विभञ्जन नामः ॥ धर्म वर्म नर्मद गुण ग्रामः। सन्तत शं तनोतु मम रामः ॥ जदपि बिरज ब्यापक अबिनासी। सब के हृदयँ निरन्तर बासी ॥ तदपि अनुज श्री सहित खरारी। बसतु मनसि मम काननचारी ॥ जे जानहिं ते जानहुँ स्वामी। सगुन अगुन उर अन्तरजामी ॥ जो कोसल पति राजिव नयना। करु सो राम हृदय मम अयना। अस अभिमान जाइ जनि भोरे। मैं सेवक रघुपति पति मोरे ॥ सुनि मुनि बचन राम मन भाए। बहुरि हरषि मुनिबर उर लाए ॥ परम प्रसन्न जानु मुनि मोही। जो बर मागहु देउ सो तोही ॥ मुनि कह मै बर कबहुँ न जाचा। समुझि न परि झूठ का साचा ॥ तुम्हहि नीक लागै रघुराई। सो मोहि देहु दास सुखदाई ॥ अबिरल भगति बिरति बिग्याना। होहु सकल गुन ग्यान निधाना ॥ प्रभु जो दीन्ह सो बरु मैं पावा। अब सो देहु मोहि जो भावा ॥ दो. अनुज जानकी सहित प्रभु चाप बान धर राम। मम हिय गगन इन्दु इव बसहु सदा निहकाम ॥ 11 ॥ एवमस्तु करि रमानिवासा। हरषि चले कुभञ्ज रिषि पासा ॥ बहुत दिवस गुर दरसन पाएँ। भे मोहि एहिं आश्रम आएँ ॥ अब प्रभु सङ्ग जाउँ गुर पाहीं। तुम्ह कहँ नाथ निहोरा नाहीम् ॥ देखि कृपानिधि मुनि चतुराई। लिए सङ्ग बिहसै द्वौ भाई ॥ पन्थ कहत निज भगति अनूपा। मुनि आश्रम पहुँचे सुरभूपा ॥ तुरत सुतीछन गुर पहिं गयू। करि दण्डवत कहत अस भयू ॥ नाथ कौसलाधीस कुमारा। आए मिलन जगत आधारा ॥ राम अनुज समेत बैदेही। निसि दिनु देव जपत हहु जेही ॥ सुनत अगस्ति तुरत उठि धाए। हरि बिलोकि लोचन जल छाए ॥ मुनि पद कमल परे द्वौ भाई। रिषि अति प्रीति लिए उर लाई ॥ सादर कुसल पूछि मुनि ग्यानी। आसन बर बैठारे आनी ॥ पुनि करि बहु प्रकार प्रभु पूजा। मोहि सम भाग्यवन्त नहिं दूजा ॥ जहँ लगि रहे अपर मुनि बृन्दा। हरषे सब बिलोकि सुखकन्दा ॥ दो. मुनि समूह महँ बैठे सन्मुख सब की ओर। सरद इन्दु तन चितवत मानहुँ निकर चकोर ॥ 12 ॥ तब रघुबीर कहा मुनि पाहीं। तुम्ह सन प्रभु दुराव कछु नाही ॥ तुम्ह जानहु जेहि कारन आयुँ। ताते तात न कहि समुझायुँ ॥ अब सो मन्त्र देहु प्रभु मोही। जेहि प्रकार मारौं मुनिद्रोही ॥ मुनि मुसकाने सुनि प्रभु बानी। पूछेहु नाथ मोहि का जानी ॥ तुम्हरेइँ भजन प्रभाव अघारी। जानुँ महिमा कछुक तुम्हारी ॥ ऊमरि तरु बिसाल तव माया। फल ब्रह्माण्ड अनेक निकाया ॥ जीव चराचर जन्तु समाना। भीतर बसहि न जानहिं आना ॥ ते फल भच्छक कठिन कराला। तव भयँ डरत सदा सौ काला ॥ ते तुम्ह सकल लोकपति साईं। पूँछेहु मोहि मनुज की नाईम् ॥ यह बर मागुँ कृपानिकेता। बसहु हृदयँ श्री अनुज समेता ॥ अबिरल भगति बिरति सतसङ्गा। चरन सरोरुह प्रीति अभङ्गा ॥ जद्यपि ब्रह्म अखण्ड अनन्ता। अनुभव गम्य भजहिं जेहि सन्ता ॥ अस तव रूप बखानुँ जानुँ। फिरि फिरि सगुन ब्रह्म रति मानुँ ॥ सन्तत दासन्ह देहु बड़आई। तातें मोहि पूँछेहु रघुराई ॥ है प्रभु परम मनोहर ठ्AUँ। पावन पञ्चबटी तेहि न्AUँ ॥ दण्डक बन पुनीत प्रभु करहू। उग्र साप मुनिबर कर हरहू ॥ बास करहु तहँ रघुकुल राया। कीजे सकल मुनिन्ह पर दाया ॥ चले राम मुनि आयसु पाई। तुरतहिं पञ्चबटी निअराई ॥ दो. गीधराज सैं भैण्ट भि बहु बिधि प्रीति बढ़आइ ॥ गोदावरी निकट प्रभु रहे परन गृह छाइ ॥ 13 ॥ जब ते राम कीन्ह तहँ बासा। सुखी भे मुनि बीती त्रासा ॥ गिरि बन नदीं ताल छबि छाए। दिन दिन प्रति अति हौहिं सुहाए ॥ खग मृग बृन्द अनन्दित रहहीं। मधुप मधुर गञ्जत छबि लहहीम् ॥ सो बन बरनि न सक अहिराजा। जहाँ प्रगट रघुबीर बिराजा ॥ एक बार प्रभु सुख आसीना। लछिमन बचन कहे छलहीना ॥ सुर नर मुनि सचराचर साईं। मैं पूछुँ निज प्रभु की नाई ॥ मोहि समुझाइ कहहु सोइ देवा। सब तजि करौं चरन रज सेवा ॥ कहहु ग्यान बिराग अरु माया। कहहु सो भगति करहु जेहिं दाया ॥ दो. ईस्वर जीव भेद प्रभु सकल कहौ समुझाइ ॥ जातें होइ चरन रति सोक मोह भ्रम जाइ ॥ 14 ॥ थोरेहि महँ सब कहुँ बुझाई। सुनहु तात मति मन चित लाई ॥ मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया ॥ गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई ॥ तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ। बिद्या अपर अबिद्या दोऊ ॥ एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा। जा बस जीव परा भवकूपा ॥ एक रचि जग गुन बस जाकें। प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकेम् ॥ ग्यान मान जहँ एकु नाहीं। देख ब्रह्म समान सब माही ॥ कहिअ तात सो परम बिरागी। तृन सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी ॥ दो. माया ईस न आपु कहुँ जान कहिअ सो जीव। बन्ध मोच्छ प्रद सर्बपर माया प्रेरक सीव ॥ 15 ॥ धर्म तें बिरति जोग तें ग्याना। ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना ॥ जातें बेगि द्रवुँ मैं भाई। सो मम भगति भगत सुखदाई ॥ सो सुतन्त्र अवलम्ब न आना। तेहि आधीन ग्यान बिग्याना ॥ भगति तात अनुपम सुखमूला। मिलि जो सन्त होइँ अनुकूला ॥ भगति कि साधन कहुँ बखानी। सुगम पन्थ मोहि पावहिं प्रानी ॥ प्रथमहिं बिप्र चरन अति प्रीती। निज निज कर्म निरत श्रुति रीती ॥ एहि कर फल पुनि बिषय बिरागा। तब मम धर्म उपज अनुरागा ॥ श्रवनादिक नव भक्ति दृढ़आहीं। मम लीला रति अति मन माहीम् ॥ सन्त चरन पङ्कज अति प्रेमा। मन क्रम बचन भजन दृढ़ नेमा ॥ गुरु पितु मातु बन्धु पति देवा। सब मोहि कहँ जाने दृढ़ सेवा ॥ मम गुन गावत पुलक सरीरा। गदगद गिरा नयन बह नीरा ॥ काम आदि मद दम्भ न जाकें। तात निरन्तर बस मैं ताकेम् ॥ दो. बचन कर्म मन मोरि गति भजनु करहिं निःकाम ॥ तिन्ह के हृदय कमल महुँ करुँ सदा बिश्राम ॥ 16 ॥ भगति जोग सुनि अति सुख पावा। लछिमन प्रभु चरनन्हि सिरु नावा ॥ एहि बिधि गे कछुक दिन बीती। कहत बिराग ग्यान गुन नीती ॥ सूपनखा रावन कै बहिनी। दुष्ट हृदय दारुन जस अहिनी ॥ पञ्चबटी सो गि एक बारा। देखि बिकल भि जुगल कुमारा ॥ भ्राता पिता पुत्र उरगारी। पुरुष मनोहर निरखत नारी ॥ होइ बिकल सक मनहि न रोकी। जिमि रबिमनि द्रव रबिहि बिलोकी ॥ रुचिर रुप धरि प्रभु पहिं जाई। बोली बचन बहुत मुसुकाई ॥ तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी। यह सँजोग बिधि रचा बिचारी ॥ मम अनुरूप पुरुष जग माहीं। देखेउँ खोजि लोक तिहु नाहीम् ॥ ताते अब लगि रहिउँ कुमारी। मनु माना कछु तुम्हहि निहारी ॥ सीतहि चिति कही प्रभु बाता। अहि कुआर मोर लघु भ्राता ॥ गि लछिमन रिपु भगिनी जानी। प्रभु बिलोकि बोले मृदु बानी ॥ सुन्दरि सुनु मैं उन्ह कर दासा। पराधीन नहिं तोर सुपासा ॥ प्रभु समर्थ कोसलपुर राजा। जो कछु करहिं उनहि सब छाजा ॥ सेवक सुख चह मान भिखारी। ब्यसनी धन सुभ गति बिभिचारी ॥ लोभी जसु चह चार गुमानी। नभ दुहि दूध चहत ए प्रानी ॥ पुनि फिरि राम निकट सो आई। प्रभु लछिमन पहिं बहुरि पठाई ॥ लछिमन कहा तोहि सो बरी। जो तृन तोरि लाज परिहरी ॥ तब खिसिआनि राम पहिं गी। रूप भयङ्कर प्रगटत भी ॥ सीतहि सभय देखि रघुराई। कहा अनुज सन सयन बुझाई ॥ दो. लछिमन अति लाघवँ सो नाक कान बिनु कीन्हि। ताके कर रावन कहँ मनौ चुनौती दीन्हि ॥ 17 ॥ नाक कान बिनु भि बिकरारा। जनु स्त्रव सैल गैरु कै धारा ॥ खर दूषन पहिं गि बिलपाता। धिग धिग तव पौरुष बल भ्राता ॥ तेहि पूछा सब कहेसि बुझाई। जातुधान सुनि सेन बनाई ॥ धाए निसिचर निकर बरूथा। जनु सपच्छ कज्जल गिरि जूथा ॥ नाना बाहन नानाकारा। नानायुध धर घोर अपारा ॥ सुपनखा आगें करि लीनी। असुभ रूप श्रुति नासा हीनी ॥ असगुन अमित होहिं भयकारी। गनहिं न मृत्यु बिबस सब झारी ॥ गर्जहि तर्जहिं गगन उड़आहीं। देखि कटकु भट अति हरषाहीम् ॥ कौ कह जिअत धरहु द्वौ भाई। धरि मारहु तिय लेहु छड़आई ॥ धूरि पूरि नभ मण्डल रहा। राम बोलाइ अनुज सन कहा ॥ लै जानकिहि जाहु गिरि कन्दर। आवा निसिचर कटकु भयङ्कर ॥ रहेहु सजग सुनि प्रभु कै बानी। चले सहित श्री सर धनु पानी ॥ देखि राम रिपुदल चलि आवा। बिहसि कठिन कोदण्ड चढ़आवा ॥ छं. कोदण्ड कठिन चढ़आइ सिर जट जूट बाँधत सोह क्यों। मरकत सयल पर लरत दामिनि कोटि सों जुग भुजग ज्योम् ॥ कटि कसि निषङ्ग बिसाल भुज गहि चाप बिसिख सुधारि कै ॥ चितवत मनहुँ मृगराज प्रभु गजराज घटा निहारि कै ॥ सो. आइ गे बगमेल धरहु धरहु धावत सुभट। जथा बिलोकि अकेल बाल रबिहि घेरत दनुज ॥ 18 ॥ प्रभु बिलोकि सर सकहिं न डारी। थकित भी रजनीचर धारी ॥ सचिव बोलि बोले खर दूषन। यह कौ नृपबालक नर भूषन ॥ नाग असुर सुर नर मुनि जेते। देखे जिते हते हम केते ॥ हम भरि जन्म सुनहु सब भाई। देखी नहिं असि सुन्दरताई ॥ जद्यपि भगिनी कीन्ह कुरूपा। बध लायक नहिं पुरुष अनूपा ॥ देहु तुरत निज नारि दुराई। जीअत भवन जाहु द्वौ भाई ॥ मोर कहा तुम्ह ताहि सुनावहु। तासु बचन सुनि आतुर आवहु ॥ दूतन्ह कहा राम सन जाई। सुनत राम बोले मुसकाई ॥ हम छत्री मृगया बन करहीं। तुम्ह से खल मृग खौजत फिरहीम् ॥ रिपु बलवन्त देखि नहिं डरहीं। एक बार कालहु सन लरहीम् ॥ जद्यपि मनुज दनुज कुल घालक। मुनि पालक खल सालक बालक ॥ जौं न होइ बल घर फिरि जाहू। समर बिमुख मैं हतुँ न काहू ॥ रन चढ़इ करिअ कपट चतुराई। रिपु पर कृपा परम कदराई ॥ दूतन्ह जाइ तुरत सब कहेऊ। सुनि खर दूषन उर अति दहेऊ ॥ छं. उर दहेउ कहेउ कि धरहु धाए बिकट भट रजनीचरा। सर चाप तोमर सक्ति सूल कृपान परिघ परसु धरा ॥ प्रभु कीन्ह धनुष टकोर प्रथम कठोर घोर भयावहा। भे बधिर ब्याकुल जातुधान न ग्यान तेहि अवसर रहा ॥ दो. सावधान होइ धाए जानि सबल आराति। लागे बरषन राम पर अस्त्र सस्त्र बहु भाँति ॥ 19(क) ॥ तिन्ह के आयुध तिल सम करि काटे रघुबीर। तानि सरासन श्रवन लगि पुनि छाँड़ए निज तीर ॥ 19(ख) ॥ छं. तब चले जान बबान कराल। फुङ्करत जनु बहु ब्याल ॥ कोपेउ समर श्रीराम। चले बिसिख निसित निकाम ॥ अवलोकि खरतर तीर। मुरि चले निसिचर बीर ॥ भे क्रुद्ध तीनिउ भाइ। जो भागि रन ते जाइ ॥ तेहि बधब हम निज पानि। फिरे मरन मन महुँ ठानि ॥ आयुध अनेक प्रकार। सनमुख ते करहिं प्रहार ॥ रिपु परम कोपे जानि। प्रभु धनुष सर सन्धानि ॥ छाँड़ए बिपुल नाराच। लगे कटन बिकट पिसाच ॥ उर सीस भुज कर चरन। जहँ तहँ लगे महि परन ॥ चिक्करत लागत बान। धर परत कुधर समान ॥ भट कटत तन सत खण्ड। पुनि उठत करि पाषण्ड ॥ नभ उड़त बहु भुज मुण्ड। बिनु मौलि धावत रुण्ड ॥ खग कङ्क काक सृगाल। कटकटहिं कठिन कराल ॥ छं. कटकटहिं ज़म्बुक भूत प्रेत पिसाच खर्पर सञ्चहीं। बेताल बीर कपाल ताल बजाइ जोगिनि नञ्चहीम् ॥ रघुबीर बान प्रचण्ड खण्डहिं भटन्ह के उर भुज सिरा। जहँ तहँ परहिं उठि लरहिं धर धरु धरु करहिं भयकर गिरा ॥ अन्तावरीं गहि उड़त गीध पिसाच कर गहि धावहीम् ॥ सङ्ग्राम पुर बासी मनहुँ बहु बाल गुड़ई उड़आवहीम् ॥ मारे पछारे उर बिदारे बिपुल भट कहँरत परे। अवलोकि निज दल बिकल भट तिसिरादि खर दूषन फिरे ॥ सर सक्ति तोमर परसु सूल कृपान एकहि बारहीं। करि कोप श्रीरघुबीर पर अगनित निसाचर डारहीम् ॥ प्रभु निमिष महुँ रिपु सर निवारि पचारि डारे सायका। दस दस बिसिख उर माझ मारे सकल निसिचर नायका ॥ महि परत उठि भट भिरत मरत न करत माया अति घनी। सुर डरत चौदह सहस प्रेत बिलोकि एक अवध धनी ॥ सुर मुनि सभय प्रभु देखि मायानाथ अति कौतुक कर् यो। देखहि परसपर राम करि सङ्ग्राम रिपुदल लरि मर् यो ॥ दो. राम राम कहि तनु तजहिं पावहिं पद निर्बान। करि उपाय रिपु मारे छन महुँ कृपानिधान ॥ 20(क) ॥ हरषित बरषहिं सुमन सुर बाजहिं गगन निसान। अस्तुति करि करि सब चले सोभित बिबिध बिमान ॥ 20(ख) ॥ जब रघुनाथ समर रिपु जीते। सुर नर मुनि सब के भय बीते ॥ तब लछिमन सीतहि लै आए। प्रभु पद परत हरषि उर लाए। सीता चितव स्याम मृदु गाता। परम प्रेम लोचन न अघाता ॥ पञ्चवटीं बसि श्रीरघुनायक। करत चरित सुर मुनि सुखदायक ॥ धुआँ देखि खरदूषन केरा। जाइ सुपनखाँ रावन प्रेरा ॥ बोलि बचन क्रोध करि भारी। देस कोस कै सुरति बिसारी ॥ करसि पान सोवसि दिनु राती। सुधि नहिं तव सिर पर आराती ॥ राज नीति बिनु धन बिनु धर्मा। हरिहि समर्पे बिनु सतकर्मा ॥ बिद्या बिनु बिबेक उपजाएँ। श्रम फल पढ़ए किएँ अरु पाएँ ॥ सङ्ग ते जती कुमन्त्र ते राजा। मान ते ग्यान पान तें लाजा ॥ प्रीति प्रनय बिनु मद ते गुनी। नासहि बेगि नीति अस सुनी ॥ सो. रिपु रुज पावक पाप प्रभु अहि गनिअ न छोट करि। अस कहि बिबिध बिलाप करि लागी रोदन करन ॥ 21(क) ॥ दो. सभा माझ परि ब्याकुल बहु प्रकार कह रोइ। तोहि जिअत दसकन्धर मोरि कि असि गति होइ ॥ 21(ख) ॥ सुनत सभासद उठे अकुलाई। समुझाई गहि बाहँ उठाई ॥ कह लङ्केस कहसि निज बाता। केँइँ तव नासा कान निपाता ॥ अवध नृपति दसरथ के जाए। पुरुष सिङ्घ बन खेलन आए ॥ समुझि परी मोहि उन्ह कै करनी। रहित निसाचर करिहहिं धरनी ॥ जिन्ह कर भुजबल पाइ दसानन। अभय भे बिचरत मुनि कानन ॥ देखत बालक काल समाना। परम धीर धन्वी गुन नाना ॥ अतुलित बल प्रताप द्वौ भ्राता। खल बध रत सुर मुनि सुखदाता ॥ सोभाधाम राम अस नामा। तिन्ह के सङ्ग नारि एक स्यामा ॥ रुप रासि बिधि नारि सँवारी। रति सत कोटि तासु बलिहारी ॥ तासु अनुज काटे श्रुति नासा। सुनि तव भगिनि करहिं परिहासा ॥ खर दूषन सुनि लगे पुकारा। छन महुँ सकल कटक उन्ह मारा ॥ खर दूषन तिसिरा कर घाता। सुनि दससीस जरे सब गाता ॥ दो. सुपनखहि समुझाइ करि बल बोलेसि बहु भाँति। गयु भवन अति सोचबस नीद परि नहिं राति ॥ 22 ॥ सुर नर असुर नाग खग माहीं। मोरे अनुचर कहँ कौ नाहीम् ॥ खर दूषन मोहि सम बलवन्ता। तिन्हहि को मारि बिनु भगवन्ता ॥ सुर रञ्जन भञ्जन महि भारा। जौं भगवन्त लीन्ह अवतारा ॥ तौ मै जाइ बैरु हठि करूँ। प्रभु सर प्रान तजें भव तरूँ ॥ होइहि भजनु न तामस देहा। मन क्रम बचन मन्त्र दृढ़ एहा ॥ जौं नररुप भूपसुत कोऊ। हरिहुँ नारि जीति रन दोऊ ॥ चला अकेल जान चढि तहवाँ। बस मारीच सिन्धु तट जहवाँ ॥ इहाँ राम जसि जुगुति बनाई। सुनहु उमा सो कथा सुहाई ॥ दो. लछिमन गे बनहिं जब लेन मूल फल कन्द। जनकसुता सन बोले बिहसि कृपा सुख बृन्द ॥ 23 ॥ सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला। मैं कछु करबि ललित नरलीला ॥ तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा। जौ लगि करौं निसाचर नासा ॥ जबहिं राम सब कहा बखानी। प्रभु पद धरि हियँ अनल समानी ॥ निज प्रतिबिम्ब राखि तहँ सीता। तैसि सील रुप सुबिनीता ॥ लछिमनहूँ यह मरमु न जाना। जो कछु चरित रचा भगवाना ॥ दसमुख गयु जहाँ मारीचा। नाइ माथ स्वारथ रत नीचा ॥ नवनि नीच कै अति दुखदाई। जिमि अङ्कुस धनु उरग बिलाई ॥ भयदायक खल कै प्रिय बानी। जिमि अकाल के कुसुम भवानी ॥ दो. करि पूजा मारीच तब सादर पूछी बात। कवन हेतु मन ब्यग्र अति अकसर आयहु तात ॥ 24 ॥ दसमुख सकल कथा तेहि आगें। कही सहित अभिमान अभागेम् ॥ होहु कपट मृग तुम्ह छलकारी। जेहि बिधि हरि आनौ नृपनारी ॥ तेहिं पुनि कहा सुनहु दससीसा। ते नररुप चराचर ईसा ॥ तासों तात बयरु नहिं कीजे। मारें मरिअ जिआएँ जीजै ॥ मुनि मख राखन गयु कुमारा। बिनु फर सर रघुपति मोहि मारा ॥ सत जोजन आयुँ छन माहीं। तिन्ह सन बयरु किएँ भल नाहीम् ॥ भि मम कीट भृङ्ग की नाई। जहँ तहँ मैं देखुँ दौ भाई ॥ जौं नर तात तदपि अति सूरा। तिन्हहि बिरोधि न आइहि पूरा ॥ दो. जेहिं ताड़का सुबाहु हति खण्डेउ हर कोदण्ड ॥ खर दूषन तिसिरा बधेउ मनुज कि अस बरिबण्ड ॥ 25 ॥ जाहु भवन कुल कुसल बिचारी। सुनत जरा दीन्हिसि बहु गारी ॥ गुरु जिमि मूढ़ करसि मम बोधा। कहु जग मोहि समान को जोधा ॥ तब मारीच हृदयँ अनुमाना। नवहि बिरोधें नहिं कल्याना ॥ सस्त्री मर्मी प्रभु सठ धनी। बैद बन्दि कबि भानस गुनी ॥ उभय भाँति देखा निज मरना। तब ताकिसि रघुनायक सरना ॥ उतरु देत मोहि बधब अभागें। कस न मरौं रघुपति सर लागेम् ॥ अस जियँ जानि दसानन सङ्गा। चला राम पद प्रेम अभङ्गा ॥ मन अति हरष जनाव न तेही। आजु देखिहुँ परम सनेही ॥ छं. निज परम प्रीतम देखि लोचन सुफल करि सुख पाइहौं। श्री सहित अनुज समेत कृपानिकेत पद मन लाइहौम् ॥ निर्बान दायक क्रोध जा कर भगति अबसहि बसकरी। निज पानि सर सन्धानि सो मोहि बधिहि सुखसागर हरी ॥ दो. मम पाछें धर धावत धरें सरासन बान। फिरि फिरि प्रभुहि बिलोकिहुँ धन्य न मो सम आन ॥ 26 ॥ तेहि बन निकट दसानन गयू। तब मारीच कपटमृग भयू ॥ अति बिचित्र कछु बरनि न जाई। कनक देह मनि रचित बनाई ॥ सीता परम रुचिर मृग देखा। अङ्ग अङ्ग सुमनोहर बेषा ॥ सुनहु देव रघुबीर कृपाला। एहि मृग कर अति सुन्दर छाला ॥ सत्यसन्ध प्रभु बधि करि एही। आनहु चर्म कहति बैदेही ॥ तब रघुपति जानत सब कारन। उठे हरषि सुर काजु सँवारन ॥ मृग बिलोकि कटि परिकर बाँधा। करतल चाप रुचिर सर साँधा ॥ प्रभु लछिमनिहि कहा समुझाई। फिरत बिपिन निसिचर बहु भाई ॥ सीता केरि करेहु रखवारी। बुधि बिबेक बल समय बिचारी ॥ प्रभुहि बिलोकि चला मृग भाजी। धाए रामु सरासन साजी ॥ निगम नेति सिव ध्यान न पावा। मायामृग पाछें सो धावा ॥ कबहुँ निकट पुनि दूरि पराई। कबहुँक प्रगटि कबहुँ छपाई ॥ प्रगटत दुरत करत छल भूरी। एहि बिधि प्रभुहि गयु लै दूरी ॥ तब तकि राम कठिन सर मारा। धरनि परेउ करि घोर पुकारा ॥ लछिमन कर प्रथमहिं लै नामा। पाछें सुमिरेसि मन महुँ रामा ॥ प्रान तजत प्रगटेसि निज देहा। सुमिरेसि रामु समेत सनेहा ॥ अन्तर प्रेम तासु पहिचाना। मुनि दुर्लभ गति दीन्हि सुजाना ॥ दो. बिपुल सुमन सुर बरषहिं गावहिं प्रभु गुन गाथ। निज पद दीन्ह असुर कहुँ दीनबन्धु रघुनाथ ॥ 27 ॥ खल बधि तुरत फिरे रघुबीरा। सोह चाप कर कटि तूनीरा ॥ आरत गिरा सुनी जब सीता। कह लछिमन सन परम सभीता ॥ जाहु बेगि सङ्कट अति भ्राता। लछिमन बिहसि कहा सुनु माता ॥ भृकुटि बिलास सृष्टि लय होई। सपनेहुँ सङ्कट परि कि सोई ॥ मरम बचन जब सीता बोला। हरि प्रेरित लछिमन मन डोला ॥ बन दिसि देव सौम्पि सब काहू। चले जहाँ रावन ससि राहू ॥ सून बीच दसकन्धर देखा। आवा निकट जती कें बेषा ॥ जाकें डर सुर असुर डेराहीं। निसि न नीद दिन अन्न न खाहीम् ॥ सो दससीस स्वान की नाई। इत उत चिति चला भड़इहाई ॥ इमि कुपन्थ पग देत खगेसा। रह न तेज बुधि बल लेसा ॥ नाना बिधि करि कथा सुहाई। राजनीति भय प्रीति देखाई ॥ कह सीता सुनु जती गोसाईं। बोलेहु बचन दुष्ट की नाईम् ॥ तब रावन निज रूप देखावा। भी सभय जब नाम सुनावा ॥ कह सीता धरि धीरजु गाढ़आ। आइ गयु प्रभु रहु खल ठाढ़आ ॥ जिमि हरिबधुहि छुद्र सस चाहा। भेसि कालबस निसिचर नाहा ॥ सुनत बचन दससीस रिसाना। मन महुँ चरन बन्दि सुख माना ॥ दो. क्रोधवन्त तब रावन लीन्हिसि रथ बैठाइ। चला गगनपथ आतुर भयँ रथ हाँकि न जाइ ॥ 28 ॥ हा जग एक बीर रघुराया। केहिं अपराध बिसारेहु दाया ॥ आरति हरन सरन सुखदायक। हा रघुकुल सरोज दिननायक ॥ हा लछिमन तुम्हार नहिं दोसा। सो फलु पायुँ कीन्हेउँ रोसा ॥ बिबिध बिलाप करति बैदेही। भूरि कृपा प्रभु दूरि सनेही ॥ बिपति मोरि को प्रभुहि सुनावा। पुरोडास चह रासभ खावा ॥ सीता कै बिलाप सुनि भारी। भे चराचर जीव दुखारी ॥ गीधराज सुनि आरत बानी। रघुकुलतिलक नारि पहिचानी ॥ अधम निसाचर लीन्हे जाई। जिमि मलेछ बस कपिला गाई ॥ सीते पुत्रि करसि जनि त्रासा। करिहुँ जातुधान कर नासा ॥ धावा क्रोधवन्त खग कैसें। छूटि पबि परबत कहुँ जैसे ॥ रे रे दुष्ट ठाढ़ किन होही। निर्भय चलेसि न जानेहि मोही ॥ आवत देखि कृतान्त समाना। फिरि दसकन्धर कर अनुमाना ॥ की मैनाक कि खगपति होई। मम बल जान सहित पति सोई ॥ जाना जरठ जटायू एहा। मम कर तीरथ छाँड़इहि देहा ॥ सुनत गीध क्रोधातुर धावा। कह सुनु रावन मोर सिखावा ॥ तजि जानकिहि कुसल गृह जाहू। नाहिं त अस होइहि बहुबाहू ॥ राम रोष पावक अति घोरा। होइहि सकल सलभ कुल तोरा ॥ उतरु न देत दसानन जोधा। तबहिं गीध धावा करि क्रोधा ॥ धरि कच बिरथ कीन्ह महि गिरा। सीतहि राखि गीध पुनि फिरा ॥ चौचन्ह मारि बिदारेसि देही। दण्ड एक भि मुरुछा तेही ॥ तब सक्रोध निसिचर खिसिआना। काढ़एसि परम कराल कृपाना ॥ काटेसि पङ्ख परा खग धरनी। सुमिरि राम करि अदभुत करनी ॥ सीतहि जानि चढ़आइ बहोरी। चला उताइल त्रास न थोरी ॥ करति बिलाप जाति नभ सीता। ब्याध बिबस जनु मृगी सभीता ॥ गिरि पर बैठे कपिन्ह निहारी। कहि हरि नाम दीन्ह पट डारी ॥ एहि बिधि सीतहि सो लै गयू। बन असोक महँ राखत भयू ॥ दो. हारि परा खल बहु बिधि भय अरु प्रीति देखाइ। तब असोक पादप तर राखिसि जतन कराइ ॥ 29(क) ॥ नवान्हपारायण, छठा विश्राम जेहि बिधि कपट कुरङ्ग सँग धाइ चले श्रीराम। सो छबि सीता राखि उर रटति रहति हरिनाम ॥ 29(ख) ॥ रघुपति अनुजहि आवत देखी। बाहिज चिन्ता कीन्हि बिसेषी ॥ जनकसुता परिहरिहु अकेली। आयहु तात बचन मम पेली ॥ निसिचर निकर फिरहिं बन माहीं। मम मन सीता आश्रम नाहीम् ॥ गहि पद कमल अनुज कर जोरी। कहेउ नाथ कछु मोहि न खोरी ॥ अनुज समेत गे प्रभु तहवाँ। गोदावरि तट आश्रम जहवाँ ॥ आश्रम देखि जानकी हीना। भे बिकल जस प्राकृत दीना ॥ हा गुन खानि जानकी सीता। रूप सील ब्रत नेम पुनीता ॥ लछिमन समुझाए बहु भाँती। पूछत चले लता तरु पाँती ॥ हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी। तुम्ह देखी सीता मृगनैनी ॥ खञ्जन सुक कपोत मृग मीना। मधुप निकर कोकिला प्रबीना ॥ कुन्द कली दाड़इम दामिनी। कमल सरद ससि अहिभामिनी ॥ बरुन पास मनोज धनु हंसा। गज केहरि निज सुनत प्रसंसा ॥ श्रीफल कनक कदलि हरषाहीं। नेकु न सङ्क सकुच मन माहीम् ॥ सुनु जानकी तोहि बिनु आजू। हरषे सकल पाइ जनु राजू ॥ किमि सहि जात अनख तोहि पाहीम् । प्रिया बेगि प्रगटसि कस नाहीम् ॥ एहि बिधि खौजत बिलपत स्वामी। मनहुँ महा बिरही अति कामी ॥ पूरनकाम राम सुख रासी। मनुज चरित कर अज अबिनासी ॥ आगे परा गीधपति देखा। सुमिरत राम चरन जिन्ह रेखा ॥ दो. कर सरोज सिर परसेउ कृपासिन्धु रधुबीर ॥ निरखि राम छबि धाम मुख बिगत भी सब पीर ॥ 30 ॥ तब कह गीध बचन धरि धीरा । सुनहु राम भञ्जन भव भीरा ॥ नाथ दसानन यह गति कीन्ही। तेहि खल जनकसुता हरि लीन्ही ॥ लै दच्छिन दिसि गयु गोसाई। बिलपति अति कुररी की नाई ॥ दरस लागी प्रभु राखेंउँ प्राना। चलन चहत अब कृपानिधाना ॥ राम कहा तनु राखहु ताता। मुख मुसकाइ कही तेहिं बाता ॥ जा कर नाम मरत मुख आवा। अधमु मुकुत होई श्रुति गावा ॥ सो मम लोचन गोचर आगें। राखौं देह नाथ केहि खाँगेँ ॥ जल भरि नयन कहहिँ रघुराई। तात कर्म निज ते गतिं पाई ॥ परहित बस जिन्ह के मन माहीँ। तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीँ ॥ तनु तजि तात जाहु मम धामा। देउँ काह तुम्ह पूरनकामा ॥ दो. सीता हरन तात जनि कहहु पिता सन जाइ ॥ जौँ मैँ राम त कुल सहित कहिहि दसानन आइ ॥ 31 ॥ गीध देह तजि धरि हरि रुपा। भूषन बहु पट पीत अनूपा ॥ स्याम गात बिसाल भुज चारी। अस्तुति करत नयन भरि बारी ॥ छं. जय राम रूप अनूप निर्गुन सगुन गुन प्रेरक सही। दससीस बाहु प्रचण्ड खण्डन चण्ड सर मण्डन मही ॥ पाथोद गात सरोज मुख राजीव आयत लोचनं। नित नौमि रामु कृपाल बाहु बिसाल भव भय मोचनम् ॥ 1 ॥ बलमप्रमेयमनादिमजमब्यक्तमेकमगोचरं। गोबिन्द गोपर द्वन्द्वहर बिग्यानघन धरनीधरम् ॥ जे राम मन्त्र जपन्त सन्त अनन्त जन मन रञ्जनं। नित नौमि राम अकाम प्रिय कामादि खल दल गञ्जनम् ॥ 2। जेहि श्रुति निरञ्जन ब्रह्म ब्यापक बिरज अज कहि गावहीम् ॥ करि ध्यान ग्यान बिराग जोग अनेक मुनि जेहि पावहीम् ॥ सो प्रगट करुना कन्द सोभा बृन्द अग जग मोही। मम हृदय पङ्कज भृङ्ग अङ्ग अनङ्ग बहु छबि सोही ॥ 3 ॥ जो अगम सुगम सुभाव निर्मल असम सम सीतल सदा। पस्यन्ति जं जोगी जतन करि करत मन गो बस सदा ॥ सो राम रमा निवास सन्तत दास बस त्रिभुवन धनी। मम उर बसु सो समन संसृति जासु कीरति पावनी ॥ 4 ॥ दो. अबिरल भगति मागि बर गीध गयु हरिधाम। तेहि की क्रिया जथोचित निज कर कीन्ही राम ॥ 32 ॥ कोमल चित अति दीनदयाला। कारन बिनु रघुनाथ कृपाला ॥ गीध अधम खग आमिष भोगी। गति दीन्हि जो जाचत जोगी ॥ सुनहु उमा ते लोग अभागी। हरि तजि होहिं बिषय अनुरागी ॥ पुनि सीतहि खोजत द्वौ भाई। चले बिलोकत बन बहुताई ॥ सङ्कुल लता बिटप घन कानन। बहु खग मृग तहँ गज पञ्चानन ॥ आवत पन्थ कबन्ध निपाता। तेहिं सब कही साप कै बाता ॥ दुरबासा मोहि दीन्ही सापा। प्रभु पद पेखि मिटा सो पापा ॥ सुनु गन्धर्ब कहुँ मै तोही। मोहि न सोहाइ ब्रह्मकुल द्रोही ॥ दो. मन क्रम बचन कपट तजि जो कर भूसुर सेव। मोहि समेत बिरञ्चि सिव बस ताकें सब देव ॥ 33 ॥ सापत ताड़त परुष कहन्ता। बिप्र पूज्य अस गावहिं सन्ता ॥ पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना ॥ कहि निज धर्म ताहि समुझावा। निज पद प्रीति देखि मन भावा ॥ रघुपति चरन कमल सिरु नाई। गयु गगन आपनि गति पाई ॥ ताहि देइ गति राम उदारा। सबरी कें आश्रम पगु धारा ॥ सबरी देखि राम गृहँ आए। मुनि के बचन समुझि जियँ भाए ॥ सरसिज लोचन बाहु बिसाला। जटा मुकुट सिर उर बनमाला ॥ स्याम गौर सुन्दर दौ भाई। सबरी परी चरन लपटाई ॥ प्रेम मगन मुख बचन न आवा। पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा ॥ सादर जल लै चरन पखारे। पुनि सुन्दर आसन बैठारे ॥ दो. कन्द मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि। प्रेम सहित प्रभु खाए बारम्बार बखानि ॥ 34 ॥ पानि जोरि आगें भि ठाढ़ई। प्रभुहि बिलोकि प्रीति अति बाढ़ई ॥ केहि बिधि अस्तुति करौ तुम्हारी। अधम जाति मैं जड़मति भारी ॥ अधम ते अधम अधम अति नारी। तिन्ह महँ मैं मतिमन्द अघारी ॥ कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। मानुँ एक भगति कर नाता ॥ जाति पाँति कुल धर्म बड़आई। धन बल परिजन गुन चतुराई ॥ भगति हीन नर सोहि कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा ॥ नवधा भगति कहुँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीम् ॥ प्रथम भगति सन्तन्ह कर सङ्गा। दूसरि रति मम कथा प्रसङ्गा ॥ दो. गुर पद पङ्कज सेवा तीसरि भगति अमान। चौथि भगति मम गुन गन करि कपट तजि गान ॥ 35 ॥ मन्त्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पञ्चम भजन सो बेद प्रकासा ॥ छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरन्तर सज्जन धरमा ॥ सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें सन्त अधिक करि लेखा ॥ आठवँ जथालाभ सन्तोषा। सपनेहुँ नहिं देखि परदोषा ॥ नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना ॥ नव महुँ एकु जिन्ह के होई। नारि पुरुष सचराचर कोई ॥ सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरे। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरेम् ॥ जोगि बृन्द दुरलभ गति जोई। तो कहुँ आजु सुलभ भि सोई ॥ मम दरसन फल परम अनूपा। जीव पाव निज सहज सरूपा ॥ जनकसुता कि सुधि भामिनी। जानहि कहु करिबरगामिनी ॥ पम्पा सरहि जाहु रघुराई। तहँ होइहि सुग्रीव मिताई ॥ सो सब कहिहि देव रघुबीरा। जानतहूँ पूछहु मतिधीरा ॥ बार बार प्रभु पद सिरु नाई। प्रेम सहित सब कथा सुनाई ॥ छं. कहि कथा सकल बिलोकि हरि मुख हृदयँ पद पङ्कज धरे। तजि जोग पावक देह हरि पद लीन भि जहँ नहिं फिरे ॥ नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू। बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागहू ॥ दो. जाति हीन अघ जन्म महि मुक्त कीन्हि असि नारि। महामन्द मन सुख चहसि ऐसे प्रभुहि बिसारि ॥ 36 ॥ चले राम त्यागा बन सोऊ। अतुलित बल नर केहरि दोऊ ॥ बिरही इव प्रभु करत बिषादा। कहत कथा अनेक सम्बादा ॥ लछिमन देखु बिपिन कि सोभा। देखत केहि कर मन नहिं छोभा ॥ नारि सहित सब खग मृग बृन्दा। मानहुँ मोरि करत हहिं निन्दा ॥ हमहि देखि मृग निकर पराहीं। मृगीं कहहिं तुम्ह कहँ भय नाहीम् ॥ तुम्ह आनन्द करहु मृग जाए। कञ्चन मृग खोजन ए आए ॥ सङ्ग लाइ करिनीं करि लेहीं। मानहुँ मोहि सिखावनु देहीम् ॥ सास्त्र सुचिन्तित पुनि पुनि देखिअ। भूप सुसेवित बस नहिं लेखिअ ॥ राखिअ नारि जदपि उर माहीं। जुबती सास्त्र नृपति बस नाहीम् ॥ देखहु तात बसन्त सुहावा। प्रिया हीन मोहि भय उपजावा ॥ दो. बिरह बिकल बलहीन मोहि जानेसि निपट अकेल। सहित बिपिन मधुकर खग मदन कीन्ह बगमेल ॥ 37(क) ॥ देखि गयु भ्राता सहित तासु दूत सुनि बात। डेरा कीन्हेउ मनहुँ तब कटकु हटकि मनजात ॥ 37(ख) ॥ बिटप बिसाल लता अरुझानी। बिबिध बितान दिए जनु तानी ॥ कदलि ताल बर धुजा पताका। दैखि न मोह धीर मन जाका ॥ बिबिध भाँति फूले तरु नाना। जनु बानैत बने बहु बाना ॥ कहुँ कहुँ सुन्दर बिटप सुहाए। जनु भट बिलग बिलग होइ छाए ॥ कूजत पिक मानहुँ गज माते। ढेक महोख ऊँट बिसराते ॥ मोर चकोर कीर बर बाजी। पारावत मराल सब ताजी ॥ तीतिर लावक पदचर जूथा। बरनि न जाइ मनोज बरुथा ॥ रथ गिरि सिला दुन्दुभी झरना। चातक बन्दी गुन गन बरना ॥ मधुकर मुखर भेरि सहनाई। त्रिबिध बयारि बसीठीं आई ॥ चतुरङ्गिनी सेन सँग लीन्हें। बिचरत सबहि चुनौती दीन्हेम् ॥ लछिमन देखत काम अनीका। रहहिं धीर तिन्ह कै जग लीका ॥ एहि कें एक परम बल नारी। तेहि तें उबर सुभट सोइ भारी ॥ दो. तात तीनि अति प्रबल खल काम क्रोध अरु लोभ। मुनि बिग्यान धाम मन करहिं निमिष महुँ छोभ ॥ 38(क) ॥ लोभ कें इच्छा दम्भ बल काम कें केवल नारि। क्रोध के परुष बचन बल मुनिबर कहहिं बिचारि ॥ 38(ख) ॥ गुनातीत सचराचर स्वामी। राम उमा सब अन्तरजामी ॥ कामिन्ह कै दीनता देखाई। धीरन्ह कें मन बिरति दृढ़आई ॥ क्रोध मनोज लोभ मद माया। छूटहिं सकल राम कीं दाया ॥ सो नर इन्द्रजाल नहिं भूला। जा पर होइ सो नट अनुकूला ॥ उमा कहुँ मैं अनुभव अपना। सत हरि भजनु जगत सब सपना ॥ पुनि प्रभु गे सरोबर तीरा। पम्पा नाम सुभग गम्भीरा ॥ सन्त हृदय जस निर्मल बारी। बाँधे घाट मनोहर चारी ॥ जहँ तहँ पिअहिं बिबिध मृग नीरा। जनु उदार गृह जाचक भीरा ॥ दो. पुरिनि सबन ओट जल बेगि न पाइअ मर्म। मायाछन्न न देखिऐ जैसे निर्गुन ब्रह्म ॥ 39(क) ॥ सुखि मीन सब एकरस अति अगाध जल माहिं। जथा धर्मसीलन्ह के दिन सुख सञ्जुत जाहिम् ॥ 39(ख) ॥ बिकसे सरसिज नाना रङ्गा। मधुर मुखर गुञ्जत बहु भृङ्गा ॥ बोलत जलकुक्कुट कलहंसा। प्रभु बिलोकि जनु करत प्रसंसा ॥ चक्रवाक बक खग समुदाई। देखत बनि बरनि नहिं जाई ॥ सुन्दर खग गन गिरा सुहाई। जात पथिक जनु लेत बोलाई ॥ ताल समीप मुनिन्ह गृह छाए। चहु दिसि कानन बिटप सुहाए ॥ चम्पक बकुल कदम्ब तमाला। पाटल पनस परास रसाला ॥ नव पल्लव कुसुमित तरु नाना। चञ्चरीक पटली कर गाना ॥ सीतल मन्द सुगन्ध सुभ्AU। सन्तत बहि मनोहर ब्AU ॥ कुहू कुहू कोकिल धुनि करहीं। सुनि रव सरस ध्यान मुनि टरहीम् ॥ दो. फल भारन नमि बिटप सब रहे भूमि निअराइ। पर उपकारी पुरुष जिमि नवहिं सुसम्पति पाइ ॥ 40 ॥ देखि राम अति रुचिर तलावा। मज्जनु कीन्ह परम सुख पावा ॥ देखी सुन्दर तरुबर छाया। बैठे अनुज सहित रघुराया ॥ तहँ पुनि सकल देव मुनि आए। अस्तुति करि निज धाम सिधाए ॥ बैठे परम प्रसन्न कृपाला। कहत अनुज सन कथा रसाला ॥ बिरहवन्त भगवन्तहि देखी। नारद मन भा सोच बिसेषी ॥ मोर साप करि अङ्गीकारा। सहत राम नाना दुख भारा ॥ ऐसे प्रभुहि बिलोकुँ जाई। पुनि न बनिहि अस अवसरु आई ॥ यह बिचारि नारद कर बीना। गे जहाँ प्रभु सुख आसीना ॥ गावत राम चरित मृदु बानी। प्रेम सहित बहु भाँति बखानी ॥ करत दण्डवत लिए उठाई। राखे बहुत बार उर लाई ॥ स्वागत पूँछि निकट बैठारे। लछिमन सादर चरन पखारे ॥ दो. नाना बिधि बिनती करि प्रभु प्रसन्न जियँ जानि। नारद बोले बचन तब जोरि सरोरुह पानि ॥ 41 ॥ सुनहु उदार सहज रघुनायक। सुन्दर अगम सुगम बर दायक ॥ देहु एक बर मागुँ स्वामी। जद्यपि जानत अन्तरजामी ॥ जानहु मुनि तुम्ह मोर सुभ्AU। जन सन कबहुँ कि करुँ दुर्AU ॥ कवन बस्तु असि प्रिय मोहि लागी। जो मुनिबर न सकहु तुम्ह मागी ॥ जन कहुँ कछु अदेय नहिं मोरें। अस बिस्वास तजहु जनि भोरेम् ॥ तब नारद बोले हरषाई । अस बर मागुँ करुँ ढिठाई ॥ जद्यपि प्रभु के नाम अनेका। श्रुति कह अधिक एक तें एका ॥ राम सकल नामन्ह ते अधिका। हौ नाथ अघ खग गन बधिका ॥ दो. राका रजनी भगति तव राम नाम सोइ सोम। अपर नाम उडगन बिमल बसुहुँ भगत उर ब्योम ॥ 42(क) ॥ एवमस्तु मुनि सन कहेउ कृपासिन्धु रघुनाथ। तब नारद मन हरष अति प्रभु पद नायु माथ ॥ 42(ख) ॥ अति प्रसन्न रघुनाथहि जानी। पुनि नारद बोले मृदु बानी ॥ राम जबहिं प्रेरेउ निज माया। मोहेहु मोहि सुनहु रघुराया ॥ तब बिबाह मैं चाहुँ कीन्हा। प्रभु केहि कारन करै न दीन्हा ॥ सुनु मुनि तोहि कहुँ सहरोसा। भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा ॥ करुँ सदा तिन्ह कै रखवारी। जिमि बालक राखि महतारी ॥ गह सिसु बच्छ अनल अहि धाई। तहँ राखि जननी अरगाई ॥ प्रौढ़ भेँ तेहि सुत पर माता। प्रीति करि नहिं पाछिलि बाता ॥ मोरे प्रौढ़ तनय सम ग्यानी। बालक सुत सम दास अमानी ॥ जनहि मोर बल निज बल ताही। दुहु कहँ काम क्रोध रिपु आही ॥ यह बिचारि पण्डित मोहि भजहीं। पाएहुँ ग्यान भगति नहिं तजहीम् ॥ दो. काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कै धारि। तिन्ह महँ अति दारुन दुखद मायारूपी नारि ॥ 43 ॥ सुनि मुनि कह पुरान श्रुति सन्ता। मोह बिपिन कहुँ नारि बसन्ता ॥ जप तप नेम जलाश्रय झारी। होइ ग्रीषम सोषि सब नारी ॥ काम क्रोध मद मत्सर भेका। इन्हहि हरषप्रद बरषा एका ॥ दुर्बासना कुमुद समुदाई। तिन्ह कहँ सरद सदा सुखदाई ॥ धर्म सकल सरसीरुह बृन्दा। होइ हिम तिन्हहि दहि सुख मन्दा ॥ पुनि ममता जवास बहुताई। पलुहि नारि सिसिर रितु पाई ॥ पाप उलूक निकर सुखकारी। नारि निबिड़ रजनी अँधिआरी ॥ बुधि बल सील सत्य सब मीना। बनसी सम त्रिय कहहिं प्रबीना ॥ दो. अवगुन मूल सूलप्रद प्रमदा सब दुख खानि। ताते कीन्ह निवारन मुनि मैं यह जियँ जानि ॥ 44 ॥ सुनि रघुपति के बचन सुहाए। मुनि तन पुलक नयन भरि आए ॥ कहहु कवन प्रभु कै असि रीती। सेवक पर ममता अरु प्रीती ॥ जे न भजहिं अस प्रभु भ्रम त्यागी। ग्यान रङ्क नर मन्द अभागी ॥ पुनि सादर बोले मुनि नारद। सुनहु राम बिग्यान बिसारद ॥ सन्तन्ह के लच्छन रघुबीरा। कहहु नाथ भव भञ्जन भीरा ॥ सुनु मुनि सन्तन्ह के गुन कहूँ। जिन्ह ते मैं उन्ह कें बस रहूँ ॥ षट बिकार जित अनघ अकामा। अचल अकिञ्चन सुचि सुखधामा ॥ अमितबोध अनीह मितभोगी। सत्यसार कबि कोबिद जोगी ॥ सावधान मानद मदहीना। धीर धर्म गति परम प्रबीना ॥ दो. गुनागार संसार दुख रहित बिगत सन्देह ॥ तजि मम चरन सरोज प्रिय तिन्ह कहुँ देह न गेह ॥ 45 ॥ निज गुन श्रवन सुनत सकुचाहीं। पर गुन सुनत अधिक हरषाहीम् ॥ सम सीतल नहिं त्यागहिं नीती। सरल सुभाउ सबहिं सन प्रीती ॥ जप तप ब्रत दम सञ्जम नेमा। गुरु गोबिन्द बिप्र पद प्रेमा ॥ श्रद्धा छमा मयत्री दाया। मुदिता मम पद प्रीति अमाया ॥ बिरति बिबेक बिनय बिग्याना। बोध जथारथ बेद पुराना ॥ दम्भ मान मद करहिं न क्AU। भूलि न देहिं कुमारग प्AU ॥ गावहिं सुनहिं सदा मम लीला। हेतु रहित परहित रत सीला ॥ मुनि सुनु साधुन्ह के गुन जेते। कहि न सकहिं सारद श्रुति तेते ॥ छं. कहि सक न सारद सेष नारद सुनत पद पङ्कज गहे। अस दीनबन्धु कृपाल अपने भगत गुन निज मुख कहे ॥ सिरु नाह बारहिं बार चरनन्हि ब्रह्मपुर नारद गे ॥ ते धन्य तुलसीदास आस बिहाइ जे हरि रँग रँए ॥ दो. रावनारि जसु पावन गावहिं सुनहिं जे लोग। राम भगति दृढ़ पावहिं बिनु बिराग जप जोग ॥ 46(क) ॥ दीप सिखा सम जुबति तन मन जनि होसि पतङ्ग। भजहि राम तजि काम मद करहि सदा सतसङ्ग ॥ 46(ख) ॥ मासपारायण, बाईसवाँ विश्राम इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने तृतीयः सोपानः समाप्तः। (अरण्यकाण्ड समाप्त)
Ramcharit-Manas

Shri Ram Arti (श्री राम आरती)

श्री राम आरती भगवान श्रीराम की स्तुति में गाया जाने वाला एक भक्ति गीत है, जो उनके दिव्य रूप, मर्यादा, आदर्श चरित्र और धर्म की स्थापना को समर्पित है।
Arti

Dasaratha Shatakam (दाशरथी शतकम्)

दाशरथी शतकम् भगवान राम, राजा दशरथ के पुत्र को समर्पित एक भक्तिपूर्ण स्तोत्र है। इस स्तोत्र का जाप करने से दिव्य सुरक्षा, शक्ति और आध्यात्मिक उत्थान प्राप्त होता है।
Shatakam

Shri Ram Charit Manas (श्री राम चरित मानस) सुन्दरकाण्ड(Sundarkand)

श्री राम चरित मानस(Shri Ram Charit Manas) श्री राम चरित मानस - सुन्दरकाण्ड श्रीजानकीवल्लभो विजयते श्रीरामचरितमानस पञ्चम सोपान (सुन्दरकाण्ड) शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम् । रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूड़आमणिम् ॥ 1 ॥ नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा। भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च ॥ 2 ॥ अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्। सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि ॥ 3 ॥ जामवन्त के बचन सुहाए। सुनि हनुमन्त हृदय अति भाए ॥ तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कन्द मूल फल खाई ॥ जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी ॥ यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा ॥ सिन्धु तीर एक भूधर सुन्दर। कौतुक कूदि चढ़एउ ता ऊपर ॥ बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी ॥ जेहिं गिरि चरन देइ हनुमन्ता। चलेउ सो गा पाताल तुरन्ता ॥ जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना ॥ जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रमहारी ॥ दो. हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम। राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम ॥ 1 ॥ जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा ॥ सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठिन्हि आइ कही तेहिं बाता ॥ आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा ॥ राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कि सुधि प्रभुहि सुनावौम् ॥ तब तव बदन पैठिहुँ आई। सत्य कहुँ मोहि जान दे माई ॥ कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना ॥ जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा ॥ सोरह जोजन मुख तेहिं ठयू। तुरत पवनसुत बत्तिस भयू ॥ जस जस सुरसा बदनु बढ़आवा। तासु दून कपि रूप देखावा ॥ सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा ॥ बदन पिठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा ॥ मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मै पावा ॥ दो. राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान। आसिष देह गी सो हरषि चलेउ हनुमान ॥ 2 ॥ निसिचरि एक सिन्धु महुँ रही। करि माया नभु के खग गही ॥ जीव जन्तु जे गगन उड़आहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीम् ॥ गहि छाहँ सक सो न उड़आई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई ॥ सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा ॥ ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयु मतिधीरा ॥ तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुञ्जत चञ्चरीक मधु लोभा ॥ नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृन्द देखि मन भाए ॥ सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढेउ भय त्यागेम् ॥ उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई ॥ गिरि पर चढि लङ्का तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी ॥ अति उतङ्ग जलनिधि चहु पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा ॥ छं=कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुन्दरायतना घना। चुहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना ॥ गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै ॥ बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै ॥ 1 ॥ बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं। नर नाग सुर गन्धर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीम् ॥ कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं। नाना अखारेन्ह भिरहिं बहु बिधि एक एकन्ह तर्जहीम् ॥ 2 ॥ करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं। कहुँ महिष मानषु धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीम् ॥ एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही। रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही ॥ 3 ॥ दो. पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार। अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पिसार ॥ 3 ॥ मसक समान रूप कपि धरी। लङ्कहि चलेउ सुमिरि नरहरी ॥ नाम लङ्किनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निन्दरी ॥ जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा ॥ मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी ॥ पुनि सम्भारि उठि सो लङ्का। जोरि पानि कर बिनय संसका ॥ जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरञ्चि कहा मोहि चीन्हा ॥ बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर सङ्घारे ॥ तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता ॥ दो. तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अङ्ग। तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसङ्ग ॥ 4 ॥ प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कौसलपुर राजा ॥ गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिन्धु अनल सितलाई ॥ गरुड़ सुमेरु रेनू सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही ॥ अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना ॥ मन्दिर मन्दिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा ॥ गयु दसानन मन्दिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीम् ॥ सयन किए देखा कपि तेही। मन्दिर महुँ न दीखि बैदेही ॥ भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मन्दिर तहँ भिन्न बनावा ॥ दो. रामायुध अङ्कित गृह सोभा बरनि न जाइ। नव तुलसिका बृन्द तहँ देखि हरषि कपिराइ ॥ 5 ॥ लङ्का निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा ॥ मन महुँ तरक करै कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा ॥ राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा ॥ एहि सन हठि करिहुँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी ॥ बिप्र रुप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषण उठि तहँ आए ॥ करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई ॥ की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई ॥ की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी ॥ दो. तब हनुमन्त कही सब राम कथा निज नाम। सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम ॥ 6 ॥ सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी ॥ तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा ॥ तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीम् ॥ अब मोहि भा भरोस हनुमन्ता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं सन्ता ॥ जौ रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा ॥ सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती ॥ कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चञ्चल सबहीं बिधि हीना ॥ प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा ॥ दो. अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर। कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर ॥ 7 ॥ जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी ॥ एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा ॥ पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही ॥ तब हनुमन्त कहा सुनु भ्राता। देखी चहुँ जानकी माता ॥ जुगुति बिभीषन सकल सुनाई। चलेउ पवनसुत बिदा कराई ॥ करि सोइ रूप गयु पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ ॥ देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा ॥ कृस तन सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी ॥ दो. निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन। परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन ॥ 8 ॥ तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई। करि बिचार करौं का भाई ॥ तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। सङ्ग नारि बहु किएँ बनावा ॥ बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा ॥ कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मन्दोदरी आदि सब रानी ॥ तव अनुचरीं करुँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा ॥ तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही ॥ सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करि बिकासा ॥ अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की ॥ सठ सूने हरि आनेहि मोहि। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही ॥ दो. आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान। परुष बचन सुनि काढ़इ असि बोला अति खिसिआन ॥ 9 ॥ सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहुँ तव सिर कठिन कृपाना ॥ नाहिं त सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति न त जीवन हानी ॥ स्याम सरोज दाम सम सुन्दर। प्रभु भुज करि कर सम दसकन्धर ॥ सो भुज कण्ठ कि तव असि घोरा। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा ॥ चन्द्रहास हरु मम परितापं। रघुपति बिरह अनल सञ्जातम् ॥ सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा ॥ सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि नीति बुझावा ॥ कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई ॥ मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़इ कृपाना ॥ दो. भवन गयु दसकन्धर इहाँ पिसाचिनि बृन्द। सीतहि त्रास देखावहि धरहिं रूप बहु मन्द ॥ 10 ॥ त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका ॥ सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना ॥ सपनें बानर लङ्का जारी। जातुधान सेना सब मारी ॥ खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुण्डित सिर खण्डित भुज बीसा ॥ एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लङ्का मनहुँ बिभीषन पाई ॥ नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई ॥ यह सपना में कहुँ पुकारी। होइहि सत्य गेँ दिन चारी ॥ तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीम् ॥ दो. जहँ तहँ गीं सकल तब सीता कर मन सोच। मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच ॥ 11 ॥ त्रिजटा सन बोली कर जोरी। मातु बिपति सङ्गिनि तैं मोरी ॥ तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसहु बिरहु अब नहिं सहि जाई ॥ आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई ॥ सत्य करहि मम प्रीति सयानी। सुनै को श्रवन सूल सम बानी ॥ सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि ॥ निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी ॥ कह सीता बिधि भा प्रतिकूला। मिलहि न पावक मिटिहि न सूला ॥ देखिअत प्रगट गगन अङ्गारा। अवनि न आवत एकु तारा ॥ पावकमय ससि स्त्रवत न आगी। मानहुँ मोहि जानि हतभागी ॥ सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका ॥ नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना ॥ देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता ॥ सो. कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारी तब। जनु असोक अङ्गार दीन्हि हरषि उठि कर गहेउ ॥ 12 ॥ तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अङ्कित अति सुन्दर ॥ चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी ॥ जीति को सकि अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई ॥ सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना ॥ रामचन्द्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा ॥ लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई ॥ श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कहि सो प्रगट होति किन भाई ॥ तब हनुमन्त निकट चलि गयू। फिरि बैण्ठीं मन बिसमय भयू ॥ राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की ॥ यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी ॥ नर बानरहि सङ्ग कहु कैसें। कहि कथा भि सङ्गति जैसेम् ॥ दो. कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास ॥ जाना मन क्रम बचन यह कृपासिन्धु कर दास ॥ 13 ॥ हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ई। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ई ॥ बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयु तात मों कहुँ जलजाना ॥ अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी ॥ कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई ॥ सहज बानि सेवक सुख दायक। कबहुँक सुरति करत रघुनायक ॥ कबहुँ नयन मम सीतल ताता। होइहहि निरखि स्याम मृदु गाता ॥ बचनु न आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हौं निपट बिसारी ॥ देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृदु बचन बिनीता ॥ मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता ॥ जनि जननी मानहु जियँ ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना ॥ दो. रघुपति कर सन्देसु अब सुनु जननी धरि धीर। अस कहि कपि गद गद भयु भरे बिलोचन नीर ॥ 14 ॥ कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भे बिपरीता ॥ नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू ॥ कुबलय बिपिन कुन्त बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा ॥ जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा ॥ कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई ॥ तत्त्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा ॥ सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतेनहि माहीम् ॥ प्रभु सन्देसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही ॥ कह कपि हृदयँ धीर धरु माता। सुमिरु राम सेवक सुखदाता ॥ उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई ॥ दो. निसिचर निकर पतङ्ग सम रघुपति बान कृसानु। जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु ॥ 15 ॥ जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलम्बु रघुराई ॥ रामबान रबि उएँ जानकी। तम बरूथ कहँ जातुधान की ॥ अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई ॥ कछुक दिवस जननी धरु धीरा। कपिन्ह सहित ऐहहिं रघुबीरा ॥ निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं। तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिम् ॥ हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना ॥ मोरें हृदय परम सन्देहा। सुनि कपि प्रगट कीन्ह निज देहा ॥ कनक भूधराकार सरीरा। समर भयङ्कर अतिबल बीरा ॥ सीता मन भरोस तब भयू। पुनि लघु रूप पवनसुत लयू ॥ दो. सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल। प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल ॥ 16 ॥ मन सन्तोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी ॥ आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना ॥ अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू ॥ करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना ॥ बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा ॥ अब कृतकृत्य भयुँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता ॥ सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुन्दर फल रूखा ॥ सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी ॥ तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं। जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीम् ॥ दो. देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु। रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु ॥ 17 ॥ चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा। फल खाएसि तरु तोरैं लागा ॥ रहे तहाँ बहु भट रखवारे। कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे ॥ नाथ एक आवा कपि भारी। तेहिं असोक बाटिका उजारी ॥ खाएसि फल अरु बिटप उपारे। रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे ॥ सुनि रावन पठे भट नाना। तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना ॥ सब रजनीचर कपि सङ्घारे। गे पुकारत कछु अधमारे ॥ पुनि पठयु तेहिं अच्छकुमारा। चला सङ्ग लै सुभट अपारा ॥ आवत देखि बिटप गहि तर्जा। ताहि निपाति महाधुनि गर्जा ॥ दो. कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलेसि धरि धूरि। कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि ॥ 18 ॥ सुनि सुत बध लङ्केस रिसाना। पठेसि मेघनाद बलवाना ॥ मारसि जनि सुत बान्धेसु ताही। देखिअ कपिहि कहाँ कर आही ॥ चला इन्द्रजित अतुलित जोधा। बन्धु निधन सुनि उपजा क्रोधा ॥ कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटाइ गर्जा अरु धावा ॥ अति बिसाल तरु एक उपारा। बिरथ कीन्ह लङ्केस कुमारा ॥ रहे महाभट ताके सङ्गा। गहि गहि कपि मर्दि निज अङ्गा ॥ तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहुँ गजराजा। मुठिका मारि चढ़आ तरु जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई ॥ उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया। जीति न जाइ प्रभञ्जन जाया ॥ दो. ब्रह्म अस्त्र तेहिं साँधा कपि मन कीन्ह बिचार। जौं न ब्रह्मसर मानुँ महिमा मिटि अपार ॥ 19 ॥ ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहि मारा। परतिहुँ बार कटकु सङ्घारा ॥ तेहि देखा कपि मुरुछित भयू। नागपास बाँधेसि लै गयू ॥ जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बन्धन काटहिं नर ग्यानी ॥ तासु दूत कि बन्ध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा ॥ कपि बन्धन सुनि निसिचर धाए। कौतुक लागि सभाँ सब आए ॥ दसमुख सभा दीखि कपि जाई। कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई ॥ कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता ॥ देखि प्रताप न कपि मन सङ्का। जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असङ्का ॥ दो. कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद। सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद ॥ 20 ॥ कह लङ्केस कवन तैं कीसा। केहिं के बल घालेहि बन खीसा ॥ की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही। देखुँ अति असङ्क सठ तोही ॥ मारे निसिचर केहिं अपराधा। कहु सठ तोहि न प्रान कि बाधा ॥ सुन रावन ब्रह्माण्ड निकाया। पाइ जासु बल बिरचित माया ॥ जाकें बल बिरञ्चि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा। जा बल सीस धरत सहसानन। अण्डकोस समेत गिरि कानन ॥ धरि जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह ते सठन्ह सिखावनु दाता। हर कोदण्ड कठिन जेहि भञ्जा। तेहि समेत नृप दल मद गञ्जा ॥ खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली। बधे सकल अतुलित बलसाली ॥ दो. जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि। तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि ॥ 21 ॥ जानुँ मैं तुम्हारि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई ॥ समर बालि सन करि जसु पावा। सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा ॥ खायुँ फल प्रभु लागी भूँखा। कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा ॥ सब कें देह परम प्रिय स्वामी। मारहिं मोहि कुमारग गामी ॥ जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउ तनयँ तुम्हारे ॥ मोहि न कछु बाँधे कि लाजा। कीन्ह चहुँ निज प्रभु कर काजा ॥ बिनती करुँ जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन ॥ देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी। भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी ॥ जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई ॥ तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै। मोरे कहें जानकी दीजै ॥ दो. प्रनतपाल रघुनायक करुना सिन्धु खरारि। गेँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि ॥ 22 ॥ राम चरन पङ्कज उर धरहू। लङ्का अचल राज तुम्ह करहू ॥ रिषि पुलिस्त जसु बिमल मंयका। तेहि ससि महुँ जनि होहु कलङ्का ॥ राम नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा ॥ बसन हीन नहिं सोह सुरारी। सब भूषण भूषित बर नारी ॥ राम बिमुख सम्पति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई ॥ सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गे पुनि तबहिं सुखाहीम् ॥ सुनु दसकण्ठ कहुँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी ॥ सङ्कर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही ॥ दो. मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान। भजहु राम रघुनायक कृपा सिन्धु भगवान ॥ 23 ॥ जदपि कहि कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी ॥ बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी ॥ मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही ॥ उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना ॥ सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना। बेगि न हरहुँ मूढ़ कर प्राना ॥ सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए। नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध न मारिअ दूता ॥ आन दण्ड कछु करिअ गोसाँई। सबहीं कहा मन्त्र भल भाई ॥ सुनत बिहसि बोला दसकन्धर। अङ्ग भङ्ग करि पठिअ बन्दर ॥ दो. कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहुँ समुझाइ। तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ ॥ 24 ॥ पूँछहीन बानर तहँ जाइहि। तब सठ निज नाथहि लि आइहि ॥ जिन्ह कै कीन्हसि बहुत बड़आई। देखेउँûमैं तिन्ह कै प्रभुताई ॥ बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भि सहाय सारद मैं जाना ॥ जातुधान सुनि रावन बचना। लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना ॥ रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ई पूँछ कीन्ह कपि खेला ॥ कौतुक कहँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी ॥ बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी ॥ पावक जरत देखि हनुमन्ता। भयु परम लघु रुप तुरन्ता ॥ निबुकि चढ़एउ कपि कनक अटारीं। भी सभीत निसाचर नारीम् ॥ दो. हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास। अट्टहास करि गर्ज़आ कपि बढ़इ लाग अकास ॥ 25 ॥ देह बिसाल परम हरुआई। मन्दिर तें मन्दिर चढ़ धाई ॥ जरि नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला ॥ तात मातु हा सुनिअ पुकारा। एहि अवसर को हमहि उबारा ॥ हम जो कहा यह कपि नहिं होई। बानर रूप धरें सुर कोई ॥ साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरि नगर अनाथ कर जैसा ॥ जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीम् ॥ ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा न सो तेहि कारन गिरिजा ॥ उलटि पलटि लङ्का सब जारी। कूदि परा पुनि सिन्धु मझारी ॥ दो. पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि। जनकसुता के आगें ठाढ़ भयु कर जोरि ॥ 26 ॥ मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा। जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा ॥ चूड़आमनि उतारि तब दयू। हरष समेत पवनसुत लयू ॥ कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा ॥ दीन दयाल बिरिदु सम्भारी। हरहु नाथ मम सङ्कट भारी ॥ तात सक्रसुत कथा सुनाएहु। बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु ॥ मास दिवस महुँ नाथु न आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा ॥ कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना। तुम्हहू तात कहत अब जाना ॥ तोहि देखि सीतलि भि छाती। पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती ॥ दो. जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह। चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह ॥ 27 ॥ चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्त्रवहिं सुनि निसिचर नारी ॥ नाघि सिन्धु एहि पारहि आवा। सबद किलकिला कपिन्ह सुनावा ॥ हरषे सब बिलोकि हनुमाना। नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना ॥ मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीन्हेसि रामचन्द्र कर काजा ॥ मिले सकल अति भे सुखारी। तलफत मीन पाव जिमि बारी ॥ चले हरषि रघुनायक पासा। पूँछत कहत नवल इतिहासा ॥ तब मधुबन भीतर सब आए। अङ्गद सम्मत मधु फल खाए ॥ रखवारे जब बरजन लागे। मुष्टि प्रहार हनत सब भागे ॥ दो. जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज। सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज ॥ 28 ॥ जौं न होति सीता सुधि पाई। मधुबन के फल सकहिं कि खाई ॥ एहि बिधि मन बिचार कर राजा। आइ गे कपि सहित समाजा ॥ आइ सबन्हि नावा पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा ॥ पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी ॥ नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना। राखे सकल कपिन्ह के प्राना ॥ सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ। कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ। राम कपिन्ह जब आवत देखा। किएँ काजु मन हरष बिसेषा ॥ फटिक सिला बैठे द्वौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई ॥ दो. प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुञ्ज। पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कञ्ज ॥ 29 ॥ जामवन्त कह सुनु रघुराया। जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया ॥ ताहि सदा सुभ कुसल निरन्तर। सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर ॥ सोइ बिजी बिनी गुन सागर। तासु सुजसु त्रेलोक उजागर ॥ प्रभु कीं कृपा भयु सबु काजू। जन्म हमार सुफल भा आजू ॥ नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी ॥ पवनतनय के चरित सुहाए। जामवन्त रघुपतिहि सुनाए ॥ सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए ॥ कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की ॥ दो. नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट। लोचन निज पद जन्त्रित जाहिं प्रान केहिं बाट ॥ 30 ॥ चलत मोहि चूड़आमनि दीन्ही। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही ॥ नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी ॥ अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बन्धु प्रनतारति हरना ॥ मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहि अपराध नाथ हौं त्यागी ॥ अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना ॥ नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करिहिं हठि बाधा ॥ बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरि छन माहिं सरीरा ॥ नयन स्त्रवहि जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी। सीता के अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला ॥ दो. निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति। बेगि चलिय प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति ॥ 31 ॥ सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना ॥ बचन काँय मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही ॥ कह हनुमन्त बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई ॥ केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी ॥ सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कौ सुर नर मुनि तनुधारी ॥ प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा ॥ सुनु सुत उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीम् ॥ पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता ॥ दो. सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमन्त। चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवन्त ॥ 32 ॥ बार बार प्रभु चहि उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा ॥ प्रभु कर पङ्कज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा ॥ सावधान मन करि पुनि सङ्कर। लागे कहन कथा अति सुन्दर ॥ कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा ॥ कहु कपि रावन पालित लङ्का। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बङ्का ॥ प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना ॥ साखामृग के बड़इ मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई ॥ नाघि सिन्धु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा। सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई ॥ दो. ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकुल। तब प्रभावँ बड़वानलहिं जारि सकि खलु तूल ॥ 33 ॥ नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी ॥ सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी ॥ उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना ॥ यह संवाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा ॥ सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृन्दा। जय जय जय कृपाल सुखकन्दा ॥ तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा ॥ अब बिलम्बु केहि कारन कीजे। तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे ॥ कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी ॥ दो. कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ। नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ ॥ 34 ॥ प्रभु पद पङ्कज नावहिं सीसा। गरजहिं भालु महाबल कीसा ॥ देखी राम सकल कपि सेना। चिति कृपा करि राजिव नैना ॥ राम कृपा बल पाइ कपिन्दा। भे पच्छजुत मनहुँ गिरिन्दा ॥ हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भे सुन्दर सुभ नाना ॥ जासु सकल मङ्गलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती ॥ प्रभु पयान जाना बैदेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीम् ॥ जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयु रावनहि सोई ॥ चला कटकु को बरनैं पारा। गर्जहि बानर भालु अपारा ॥ नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी ॥ केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीम् ॥ छं. चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे। मन हरष सभ गन्धर्ब सुर मुनि नाग किन्नर दुख टरे ॥ कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं। जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीम् ॥ 1 ॥ सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोही। गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोही ॥ रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी। जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी ॥ 2 ॥ दो. एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर। जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर ॥ 35 ॥ उहाँ निसाचर रहहिं ससङ्का। जब ते जारि गयु कपि लङ्का ॥ निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा। नहिं निसिचर कुल केर उबारा ॥ जासु दूत बल बरनि न जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई ॥ दूतन्हि सन सुनि पुरजन बानी। मन्दोदरी अधिक अकुलानी ॥ रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी ॥ कन्त करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहु ॥ समुझत जासु दूत कि करनी। स्त्रवहीं गर्भ रजनीचर धरनी ॥ तासु नारि निज सचिव बोलाई। पठवहु कन्त जो चहहु भलाई ॥ तब कुल कमल बिपिन दुखदाई। सीता सीत निसा सम आई ॥ सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें। हित न तुम्हार सम्भु अज कीन्हेम् ॥ दो. -राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक। जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक ॥ 36 ॥ श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी ॥ सभय सुभाउ नारि कर साचा। मङ्गल महुँ भय मन अति काचा ॥ जौं आवि मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई ॥ कम्पहिं लोकप जाकी त्रासा। तासु नारि सभीत बड़इ हासा ॥ अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभाँ ममता अधिकाई ॥ मन्दोदरी हृदयँ कर चिन्ता। भयु कन्त पर बिधि बिपरीता ॥ बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई। सिन्धु पार सेना सब आई ॥ बूझेसि सचिव उचित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ट करि रहहू ॥ जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं। नर बानर केहि लेखे माही ॥ दो. सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस। राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास ॥ 37 ॥ सोइ रावन कहुँ बनि सहाई। अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई ॥ अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा ॥ पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन। बोला बचन पाइ अनुसासन ॥ जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता। मति अनुरुप कहुँ हित ताता ॥ जो आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना ॥ सो परनारि लिलार गोसाईं। तजु चुथि के चन्द कि नाई ॥ चौदह भुवन एक पति होई। भूतद्रोह तिष्टि नहिं सोई ॥ गुन सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहि न कोऊ ॥ दो. काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पन्थ। सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि सन्त ॥ 38 ॥ तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला ॥ ब्रह्म अनामय अज भगवन्ता। ब्यापक अजित अनादि अनन्ता ॥ गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपासिन्धु मानुष तनुधारी ॥ जन रञ्जन भञ्जन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता ॥ ताहि बयरु तजि नाइअ माथा। प्रनतारति भञ्जन रघुनाथा ॥ देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही ॥ सरन गेँ प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा ॥ जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन ॥ दो. बार बार पद लागुँ बिनय करुँ दससीस। परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस ॥ 39(क) ॥ मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठी यह बात। तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात ॥ 39(ख) ॥ माल्यवन्त अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना ॥ तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन ॥ रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दूरि न करहु इहाँ हि कोऊ ॥ माल्यवन्त गृह गयु बहोरी। कहि बिभीषनु पुनि कर जोरी ॥ सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीम् ॥ जहाँ सुमति तहँ सम्पति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना ॥ तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता ॥ कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी ॥ दो. तात चरन गहि मागुँ राखहु मोर दुलार। सीत देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार ॥ 40 ॥ बुध पुरान श्रुति सम्मत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी ॥ सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहि निकट मुत्यु अब आई ॥ जिअसि सदा सठ मोर जिआवा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा ॥ कहसि न खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाही ॥ मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती ॥ अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा ॥ उमा सन्त कि इहि बड़आई। मन्द करत जो करि भलाई ॥ तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा ॥ सचिव सङ्ग लै नभ पथ गयू। सबहि सुनाइ कहत अस भयू ॥ दो0=रामु सत्यसङ्कल्प प्रभु सभा कालबस तोरि। मै रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि ॥ 41 ॥ अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयूहीन भे सब तबहीम् ॥ साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी ॥ रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयु बिभव बिनु तबहिं अभागा ॥ चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीम् ॥ देखिहुँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता ॥ जे पद परसि तरी रिषिनारी। दण्डक कानन पावनकारी ॥ जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरङ्ग सङ्ग धर धाए ॥ हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मै देखिहुँ तेई ॥ दो0= जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ। ते पद आजु बिलोकिहुँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ ॥ 42 ॥ एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयु सपदि सिन्धु एहिं पारा ॥ कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कौ रिपु दूत बिसेषा ॥ ताहि राखि कपीस पहिं आए। समाचार सब ताहि सुनाए ॥ कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई ॥ कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा। कहि कपीस सुनहु नरनाहा ॥ जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया ॥ भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा ॥ सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी ॥ सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना ॥ दो0=सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि। ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि ॥ 43 ॥ कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजुँ नहिं ताहू ॥ सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीम् ॥ पापवन्त कर सहज सुभ्AU। भजनु मोर तेहि भाव न क्AU ॥ जौं पै दुष्टहृदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई ॥ निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा ॥ भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा ॥ जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनि निमिष महुँ तेते ॥ जौं सभीत आवा सरनाई। रखिहुँ ताहि प्रान की नाई ॥ दो0=उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत। जय कृपाल कहि चले अङ्गद हनू समेत ॥ 44 ॥ सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर ॥ दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानन्द दान के दाता ॥ बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी ॥ भुज प्रलम्ब कञ्जारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन ॥ सिङ्घ कन्ध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा ॥ नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता ॥ नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता ॥ सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा ॥ दो. श्रवन सुजसु सुनि आयुँ प्रभु भञ्जन भव भीर। त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर ॥ 45 ॥ अस कहि करत दण्डवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा ॥ दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा ॥ अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भयहारी ॥ कहु लङ्केस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा ॥ खल मण्डलीं बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहि केहि भाँती ॥ मैं जानुँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन न भाव अनीती ॥ बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट सङ्ग जनि देइ बिधाता ॥ अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्ह जानि जन दाया ॥ दो. तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम। जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम ॥ 46 ॥ तब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना ॥ जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा ॥ ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी ॥ तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीम् ॥ अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देखि राम पद कमल तुम्हारे ॥ तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला ॥ मैं निसिचर अति अधम सुभ्AU। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं क्AU ॥ जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा ॥ दो. -अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुञ्ज। देखेउँ नयन बिरञ्चि सिब सेब्य जुगल पद कञ्ज ॥ 47 ॥ सुनहु सखा निज कहुँ सुभ्AU। जान भुसुण्डि सम्भु गिरिज्AU ॥ जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवे सभय सरन तकि मोही ॥ तजि मद मोह कपट छल नाना। करुँ सद्य तेहि साधु समाना ॥ जननी जनक बन्धु सुत दारा। तनु धनु भवन सुह्रद परिवारा ॥ सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी ॥ समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीम् ॥ अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसि धनु जैसेम् ॥ तुम्ह सारिखे सन्त प्रिय मोरें। धरुँ देह नहिं आन निहोरेम् ॥ दो. सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम। ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम ॥ 48 ॥ सुनु लङ्केस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरेम् ॥ राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा ॥ सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी ॥ पद अम्बुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा ॥ सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अन्तरजामी ॥ उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही ॥ अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी ॥ एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिन्धु कर नीरा ॥ जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीम् ॥ अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भी अपारा ॥ दो. रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचण्ड। जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेहु राजु अखण्ड ॥ 49(क) ॥ जो सम्पति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ। सोइ सम्पदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ ॥ 49(ख) ॥ अस प्रभु छाड़इ भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना ॥ निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा ॥ पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहित उदासी ॥ बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक ॥ सुनु कपीस लङ्कापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गम्भीरा ॥ सङ्कुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँती ॥ कह लङ्केस सुनहु रघुनायक। कोटि सिन्धु सोषक तव सायक ॥ जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई ॥ दो. प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि। बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि ॥ 50 ॥ सखा कही तुम्ह नीकि उपाई। करिअ दैव जौं होइ सहाई ॥ मन्त्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा ॥ नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिन्धु करिअ मन रोसा ॥ कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा ॥ सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा ॥ अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिन्धु समीप गे रघुराई ॥ प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई ॥ जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए ॥ दो. सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह। प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह ॥ 51 ॥ प्रगट बखानहिं राम सुभ्AU। अति सप्रेम गा बिसरि दुर्AU ॥ रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने ॥ कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अङ्ग भङ्ग करि पठवहु निसिचर ॥ सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बाँधि कटक चहु पास फिराए ॥ बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि न त्यागे ॥ जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना ॥ सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हँसि तुरत छोडाए ॥ रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती ॥ दो. कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम सन्देसु उदार। सीता देइ मिलेहु न त आवा काल तुम्हार ॥ 52 ॥ तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा ॥ कहत राम जसु लङ्काँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए ॥ बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता ॥ पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी ॥ करत राज लङ्का सठ त्यागी। होइहि जब कर कीट अभागी ॥ पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई ॥ जिन्ह के जीवन कर रखवारा। भयु मृदुल चित सिन्धु बिचारा ॥ कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी। जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी ॥ दो. -की भि भेण्ट कि फिरि गे श्रवन सुजसु सुनि मोर। कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर ॥ 53 ॥ नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसेम् ॥ मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा ॥ रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना ॥ श्रवन नासिका काटै लागे। राम सपथ दीन्हे हम त्यागे ॥ पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई ॥ नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी ॥ जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा ॥ अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला ॥ दो. द्विबिद मयन्द नील नल अङ्गद गद बिकटासि। दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवन्त बलरासि ॥ 54 ॥ ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनि को नाना ॥ राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रेलोकहि गनहीम् ॥ अस मैं सुना श्रवन दसकन्धर। पदुम अठारह जूथप बन्दर ॥ नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीम् ॥ परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा ॥ सोषहिं सिन्धु सहित झष ब्याला। पूरहीं न त भरि कुधर बिसाला ॥ मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा ॥ गर्जहिं तर्जहिं सहज असङ्का। मानहु ग्रसन चहत हहिं लङ्का ॥ दो. -सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम। रावन काल कोटि कहु जीति सकहिं सङ्ग्राम ॥ 55 ॥ राम तेज बल बुधि बिपुलाई। तब भ्रातहि पूँछेउ नय नागर ॥ तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पन्थ कृपा मन माहीम् ॥ सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा ॥ सहज भीरु कर बचन दृढ़आई। सागर सन ठानी मचलाई ॥ मूढ़ मृषा का करसि बड़आई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई ॥ सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकेम् ॥ सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ई। समय बिचारि पत्रिका काढ़ई ॥ रामानुज दीन्ही यह पाती। नाथ बचाइ जुड़आवहु छाती ॥ बिहसि बाम कर लीन्ही रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन ॥ दो. -बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस। राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस ॥ 56(क) ॥ की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पङ्कज भृङ्ग। होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतङ्ग ॥ 56(ख) ॥ सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई ॥ भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा ॥ कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़इ प्रकृति अभिमानी ॥ सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा ॥ अति कोमल रघुबीर सुभ्AU। जद्यपि अखिल लोक कर र्AU ॥ मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध न एकु धरिही ॥ जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे। जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही ॥ नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिन्धु रघुनायक जहाँ ॥ करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई ॥ रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयु रहा मुनि ग्यानी ॥ बन्दि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा ॥ दो. बिनय न मानत जलधि जड़ गे तीन दिन बीति। बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति ॥ 57 ॥ लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू ॥ सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुन्दर नीती ॥ ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी ॥ क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा। ऊसर बीज बेँ फल जथा ॥ अस कहि रघुपति चाप चढ़आवा। यह मत लछिमन के मन भावा ॥ सङ्घानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अन्तर ज्वाला ॥ मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जन्तु जलनिधि जब जाने ॥ कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयु तजि माना ॥ दो. काटेहिं पि कदरी फरि कोटि जतन कौ सीञ्च। बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पि नव नीच ॥ 58 ॥ सभय सिन्धु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे ॥ गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कि नाथ सहज जड़ करनी ॥ तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रन्थनि गाए ॥ प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अही। सो तेहि भाँति रहे सुख लही ॥ प्रभु भल कीन्ही मोहि सिख दीन्ही। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही ॥ ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी ॥ प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़आई ॥ प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जौ तुम्हहि सोहाई ॥ दो. सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ। जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ ॥ 59 ॥ नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाई रिषि आसिष पाई ॥ तिन्ह के परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे ॥ मैं पुनि उर धरि प्रभुताई। करिहुँ बल अनुमान सहाई ॥ एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ ॥ एहि सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी ॥ सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा ॥ देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयु सुखारी ॥ सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बन्दि पाथोधि सिधावा ॥ छं. निज भवन गवनेउ सिन्धु श्रीरघुपतिहि यह मत भायू। यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायू ॥ सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना ॥ तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि सन्तत सठ मना ॥ दो. सकल सुमङ्गल दायक रघुनायक गुन गान। सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिन्धु बिना जलजान ॥ 60 ॥ मासपारायण, चौबीसवाँ विश्राम इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने पञ्चमः सोपानः समाप्तः । (सुन्दरकाण्ड समाप्त)
Ramcharit-Manas

Shri Venkateshwara Stotram (श्री वेंकटेश्वर स्तोत्रम्)

Shri Venkateshwara Stotram भगवान श्री वेंकटेश्वर की "Divine Glory" और "Supreme Blessings" का वर्णन करता है, जिन्हें "Lord of the Universe" और "Divine Protector" के रूप में पूजा जाता है। यह स्तोत्र भगवान वेंकटेश्वर की "Cosmic Power" और "Divine Mercy" को अभिव्यक्त करता है, जो भक्तों को जीवन में "Spiritual Peace" और "Inner Strength" प्रदान करता है। Shri Venkateshwara Stotram का जाप "Divine Protection Mantra" और "Shiva Worship Prayer" के रूप में किया जाता है। इसके नियमित पाठ से भक्तों को "Prosperity", "Victory over Obstacles" और "Mental Peace" मिलती है। यह स्तोत्र भगवान वेंकटेश्वर की "Divine Grace" और "Blessings for Success" को प्राप्त करने के लिए अत्यंत प्रभावी है। Shri Venkateshwara Stotram को "Lord Venkateshwara Prayer" और "Blessings of Lord Vishnu" के रूप में पढ़ने से व्यक्ति को "Peace and Prosperity" का अनुभव होता है।
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Shri Ramchandra Arti (1) (श्री रामचन्द्र आरती)

श्री रामचंद्र आरती भगवान श्री रामचंद्र की भक्ति और महिमा को समर्पित एक पवित्र स्तुति है।
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Shri Ram Chalisa

राम चालीसा एक भक्ति गीत है जो भगवान राम के जीवन, आदर्शों और गुणों पर आधारित है। यह 40 छन्दों से मिलकर बनी एक प्रसिद्ध प्रार्थना है। राम चालीसा का पाठ भगवान राम की कृपा पाने, शांति, सुख, और आध्यात्मिक ऊर्जा के लिए किया जाता है। इसे विशेष रूप से राम नवमी, दशहरा, दीपावली, और अन्य रामभक्त त्योहारों पर गाया जाता है। राम चालीसा का पाठ करने से भक्तों को श्रीरामचरितमानस, संपूर्ण रामायण, और हनुमान चालीसा के समान आध्यात्मिक लाभ मिलता है। यह भगवान राम के गुणों जैसे मर्यादा पुरुषोत्तम, धैर्य, और त्याग को उजागर करता है। इस प्रार्थना को सुबह और शाम के समय, राम आरती, राम मंत्र जप, या राम कथा के साथ जोड़कर पाठ करना अत्यधिक शुभ माना गया है।
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साल में दो बार क्यों मनाया जाता है हनुमान जी का जन्मोत्सव, जानिए रहस्य

Hanuman Janm Katha (हनुमान जन्म कथा): Lord Hanuman को शक्ति, भक्ति और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। वे भगवान राम के परम भक्त हैं और Ramayan Epic में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका से सभी परिचित हैं। Hanuman Ji के भक्त उन पर अटूट श्रद्धा रखते हैं और Mahabali Hanuman भी अपने Devotees की रक्षा करते हैं। Chaitra Purnima पर Hanuman Jayanti 2025 मनाई जाती है। इस साल चैत्र माह की पूर्णिमा यानी 12 April 2025 को हनुमान जयंती का उत्सव मनाया जाएगा। वहीं Valmiki Ramayan के अनुसार, Kartik Month Krishna Paksha Chaturdashi को Hanuman Janmotsav मनाया जाता है। इस साल कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी 19 October 2025 को है। अब आपके मन में सवाल उठ रहा होगा कि आखिर दो बार Lord Hanuman Birthday क्यों मनाया जाता है। आइए, विस्तार से जानते हैं। Chaitra Purnima and Hanuman Jayanti चैत्र मास की पूर्णिमा को Hanuman Jayanti Festival के रूप में मनाया जाता है। इसके पीछे एक पौराणिक कथा है। जब बाल Hanuman ने सूर्य को फल समझकर खाने की कोशिश की, तो Indra Dev ने उन पर Vajra से प्रहार किया। इससे Hanuman Ji मूर्छित हो गए। इससे उनके पिता Pawan Dev (Wind God) क्रोधित हो गए और उन्होंने हवा रोक दी। इससे पूरे ब्रह्मांड पर संकट आ गया। Gods of Hinduism की प्रार्थना के बाद Lord Brahma ने Hanuman Ji को दूसरा जीवन दिया। तब सभी देवताओं ने उन्हें अपनी-अपनी Divine Powers प्रदान कीं। जिस दिन उन्हें नया जीवन मिला, वह Chaitra Purnima Tithi थी। इसलिए इस दिन को Hanuman Jayanti Celebration के रूप में मनाया जाता है। Kartik Chaturdashi and Hanuman Janmotsav वहीं Kartik Month Krishna Chaturdashi को Hanuman Janmotsav के रूप में मनाया जाता है। Valmiki Ramayan के अनुसार, Hanuman Ji का Actual Birth इसी दिन हुआ था। इसलिए इस तिथि को उनके Spiritual Birthday के रूप में मनाने की परंपरा है।

चैत्र नवरात्रि की नवमी पर कर लें ये खास उपाय, मातारानी होंगी प्रसन्न

Navratri Remedies (Navratri ke Upay): चैत्र नवरात्रि की नवमी तिथि (Navami Tithi of Chaitra Navratri) मां दुर्गा की Worship के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस दिन Goddess Siddhidatri की पूजा की जाती है, जो सभी प्रकार की Spiritual Powers और Siddhis को प्रदान करने वाली हैं। Mata Durga को प्रसन्न करने और उनका Blessings प्राप्त करने के लिए नवमी तिथि पर कुछ विशेष spiritual rituals किए जा सकते हैं: 1. Kanya Pujan (Girl Worship Ceremony): नवमी के दिन कन्या पूजन का विशेष महत्व है। नौ कन्याओं (जो 2 से 10 वर्ष की हों) को मां दुर्गा के नौ रूपों के प्रतीक के रूप में आमंत्रित करें। उन्हें स्वच्छ स्थान पर बैठाएं, उनके पैर धोएं और रोली-कुमकुम से तिलक करें। उन्हें स्वादिष्ट भोजन (जैसे Puri, Kala Chana, Halwa) खिलाएं और दक्षिणा व उपहार (Gifts for Girls) भेंट करें। कन्याओं को विदा करते समय उनसे आशीर्वाद लें। कन्या पूजन माता को अत्यंत प्रिय है और यह एक powerful Navratri ritual माना जाता है। 2. Havan and Yagya: नवमी के दिन Fire Ritual (Havan) करना बहुत शुभ माना जाता है। आप घर पर ही किसी Pandit की सहायता से या स्वयं Durga Saptashati Mantras से हवन कर सकते हैं। हवन में Barley, Sesame Seeds, Guggul, Pure Ghee और अन्य हवन सामग्री अर्पित करें। Havan Smoke से घर की Negative Energy दूर होती है और Positive Vibes का संचार होता है। 3. Special Worship of Maa Siddhidatri: नवमी के दिन Maa Siddhidatri की Special Puja करें। उन्हें Lotus Flower अर्पित करें, जो उनका प्रिय पुष्प है। 'ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः' मंत्र का 108 बार Chanting करें। Maa Siddhidatri Aarti गाएं और उन्हें Halwa, Kala Chana और Poori का Bhog लगाएं। अपनी Wishes मां के समक्ष रखें। 4. Durga Saptashati Path: यदि संभव हो तो नवमी के दिन Durga Saptashati का Full Recitation करें। यदि पूरा पाठ करना संभव न हो तो इसके महत्वपूर्ण अध्याय जैसे Durga Kavach, Kilik Stotra और Argala Stotra का पाठ अवश्य करें। इससे Divine Blessings मिलती हैं। 5. Charity and Donations (Daan-Punya): नवमी के दिन Underprivileged लोगों को Donation देना बहुत शुभ माना जाता है। आप Grains, Clothes, Cash या अपनी श्रद्धा अनुसार किसी भी वस्तु का दान कर सकते हैं। यह act of kindness मां दुर्गा को प्रसन्न करता है। 6. Use of Yellow Color: नवमी के दिन Yellow Color का विशेष महत्व है। पूजा में Yellow Dress पहनें और मां दुर्गा को Yellow Flowers अर्पित करें। यह color positivity और auspiciousness का प्रतीक माना जाता है। 7. Apology Prayer (Kshama Yachna): Navratri के दौरान यदि कोई गलती हो गई हो तो नवमी के दिन Mata Durga से Forgiveness मांगें। सच्चे मन से मांगी गई क्षमा को मां अवश्य स्वीकार करती हैं। 8. Durga Chalisa Path: Maa Durga की स्तुति में Durga Chalisa Recitation करना भी अत्यंत फलदायी होता है और यह आपकी Spiritual Energy को बढ़ाता है। 9. Creative Activities: नवमी के दिन Creative Work में शामिल होना शुभ होता है। आप Arts, Music या किसी भी Positive Activity में अपना समय लगा सकते हैं। 10. Stay Positive: इस दिन पूर्ण रूप से Positive Thoughts में रहें और माँ दुर्गा के प्रति Devotion बनाए रखें। Negative Thinking से बचें।

श्री राम की कृपा पाने के लिए करिए इन मंत्रों का जाप, होगा सौभाग्य का उदय

Ram Navami 2025:R Chaitra Navratri 2025 के अंतिम दिन Ram Navami Festival का पावन पर्व मनाया जाता है। इस बार Ram Navami Date रविवार, 06 अप्रैल 2025 को है। शास्त्रों के अनुसार हिन्दुओं के आराध्य और Lord Vishnu Avatar भगवान श्रीराम ने त्रेता युग में चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को Madhyahna Muhurat (Midday Time) में जन्म लिया था। इसी दिन का उत्सव मनाने के लिए हर साल चैत्र माह में नवरात्र की नवमी तिथि पर रामनवमी मनाई जाती है। इस दिन पूरी दुनिया के Shri Ram Devotees अपने आराध्य Maryada Purushottam Lord Rama की पूरे मन और श्रद्धा से पूजा करते हैं। इस दिन भगवान के जन्म समय यानी मध्याह्न बेला (Midday Puja Time) तक Ram Navami Vrat (Fasting) रखा जाता है। Lord Rama साहस और वीरता का पर्याय हैं। उनकी पूजा से व्यक्ति में Inner Courage and Strength का संचार होता है। श्रीराम की छवि मर्यादा पुरुषोत्तम की है, जिनके पूजन से घर में Peace, Prosperity, and Happiness का वातावरण निर्मित होता है। इसलिए भगवान राम के आशीर्वाद को पाने के लिए Ram Navami Puja Vidhi (Rituals) से भगवान श्रीराम की पूजा करनी चाहिए। पूजा के साथ ही Lord Ram Mantra Chanting करने का भी विधान है। इस आलेख में हम आपको वे अत्यंत प्रभावशाली 108 Powerful Shri Ram Mantras बता रहे हैं, जिनके जाप से आपका कल्याण होगा। 1. ॐ परस्मै ब्रह्मने नम: 2. ॐ सर्वदेवात्मकाय नमः 3. ॐ परमात्मने नम: 4. ॐ सर्वावगुनवर्जिताया नम: 5. ॐ विभिषनप्रतिश्थात्रे नम: 6. ॐ जरामरनवर्जिताया नम: 7. ॐ यज्वने नम: 8. ॐ सर्वयज्ञाधिपाया नम: 9. ॐ धनुर्धराया नम: 10. ॐ पितवाससे नम: 11. ॐ शुउराया नम: 12. ॐ सुंदराया नम: 13. ॐ हरये नम: 14. ॐ सर्वतिइर्थमयाया नम: 15. ॐ जितवाराशये नम: 16. ॐ राम सेतुक्रूते नम: 17. ॐ महादेवादिपुउजिताया नम: 18. ॐ मायामानुश्हा चरित्राया नम: 19. ॐ धिइरोत्तगुनोत्तमाया नम: 20. ॐ अनंतगुना गम्भिइराया नम: 21. ॐ राघवाया नम: 22. ॐ पुउर्वभाश्हिने नम: 23. ॐ मितभाश्हिने नम: 24. ॐ स्मितवक्त्राया नम: 25. ॐ पुरान पुरुशोत्तमाया नम: 26. ॐ अयासाराया नम: 27. ॐ पुंयोदयाया नम: 28. ॐ महापुरुष्हाय नम: 29. ॐ परमपुरुष्हाय नम: 30. ॐ आदिपुरुष्हाय नम: 31. ॐ स्म्रैता सर्वाघा नाशनाया नम: 32. ॐ सर्वपुंयाधिका फलाया नम: 33. ॐ सुग्रिइवेप्सिता राज्यदाया नम: 34. ॐ सर्वदेवात्मकाया परस्मै नम: 35. ॐ पाराया नम: 36. ॐ पारगाया नम: 37. ॐ परेशाया नम: 38. ॐ परात्पराया नम: 39. ॐ पराकाशाया नम: 40. ॐ परस्मै धाम्ने नम: 41. ॐ परस्मै ज्योतिश्हे नम: 42. ॐ सच्चिदानंद विग्रिहाया नम: 43. ॐ महोदराया नम: 44. ॐ महा योगिने नम: 45. ॐ मुनिसंसुतसंस्तुतया नम: 46. ॐ ब्रह्मंयाया नम: 47. ॐ सौम्याय नम: 48. ॐ सर्वदेवस्तुताय नम: 49. ॐ महाभुजाय नम: 50. ॐ महादेवाय नम: 51. ॐ राम मायामारिइचहंत्रे नम: 52. ॐ राम मृतवानर्जीवनया नम: 53. ॐ सर्वदेवादि देवाय नम: 54. ॐ सुमित्रापुत्र सेविताया नम: 55. ॐ राम जयंतत्रनवरदया नम: 56. ॐ चित्रकुउता समाश्रयाया नम: 57. ॐ राम राक्षवानरा संगथिने नम: 58. ॐ राम जगद्गुरवे नम: 59. ॐ राम जितामित्राय नम: 60. ॐ राम जितक्रोधाय नम: 61. ॐ राम जितेंद्रियाया नम: 62. ॐ वरप्रदाय नम: 63. ॐ पित्रै भक्ताया नम: 64. ॐ अहल्या शाप शमनाय नम: 65. ॐ दंदकारंय पुण्यक्रिते नम: 66. ॐ धंविने नम: 67. ॐ त्रिलोकरक्षकाया नम: 68. ॐ पुंयचारित्रकिइर्तनाया नमः 69. ॐ त्रिलोकात्मने नमः 70. ॐ त्रिविक्रमाय नमः 71. ॐ वेदांतसाराय नमः 72. ॐ तातकांतकाय नमः 73. ॐ जामद्ग्ंया महादर्पदालनाय नमः 74. ॐ दशग्रिइवा शिरोहराया नमः 75. ॐ सप्तताला प्रभेत्त्रे नमः 76. ॐ हरकोदांद खान्दनाय नमः 77. ॐ विभीषना परित्रात्रे नमः 78. ॐ विराधवाधपन दिताया नमः 79. ॐ खरध्वा.सिने नमः 80. ॐ कौसलेयाय नमः 81. ॐ सदाहनुमदाश्रिताय नमः 82. ॐ व्रतधाराय नमः 83. ॐ सत्यव्रताय नमः 84. ॐ सत्यविक्रमाय नमः 85. ॐ सत्यवाचे नमः 86. ॐ वाग्मिने नमः 87. ॐ वालिप्रमाथानाया नमः 88. ॐ शरणात्राण तत्पराया नमः 89. ॐ दांताय नमः 90. ॐ विश्वमित्रप्रियाय नमः 91. ॐ जनार्दनाय नमः 92. ॐ जितामित्राय नमः 93. ॐ जैत्राय नमः 94. ॐ जानकिइवल्लभाय नमः 95. ॐ रघुपुंगवाय नमः 96. ॐ त्रिगुनात्मकाया नमः 97. ॐ त्रिमुर्तये नमः 98. ॐ दुउश्हना त्रिशिरो हंत्रे नमः 99. ॐ भवरोगस्या भेश्हजाया नमः 100. ॐ वेदात्मने नमः 101. ॐ राजीवलोचनाय नमः 102. ॐ राम शाश्वताया नमः 103. ॐ राम चंद्राय नमः 104. ॐ राम भद्राया नमः 105. ॐ राम रामाय नमः 106. ॐ सर्वदेवस्तुत नमः 107. ॐ महाभाग नमः 108. ॐ मायामारीचहन्ता नमः इन मंत्रों के उच्चारण के बाद भगवान राम की आरती करें : आरती कीजै श्री रघुवर जी की,सत् चित् आनन्द शिव सुन्दर की। दशरथ तनय कौशल्या नन्दन,सुर मुनि रक्षक दैत्य निकन्दन। अनुगत भक्त भक्त उर चन्दन,मर्यादा पुरुषोतम वर की। आरती कीजै श्री रघुवर जी की... निर्गुण सगुण अनूप रूप निधि,सकल लोक वन्दित विभिन्न विधि। हरण शोक-भय दायक नव निधि,माया रहित दिव्य नर वर की। आरती कीजै श्री रघुवर जी की... जानकी पति सुर अधिपति जगपति,अखिल लोक पालक त्रिलोक गति। विश्व वन्द्य अवन्ह अमित गति,एक मात्र गति सचराचर की। आरती कीजै श्री रघुवर जी की... शरणागत वत्सल व्रतधारी,भक्त कल्प तरुवर असुरारी। नाम लेत जग पावनकारी,वानर सखा दीन दुख हर की। आरती कीजै श्री रघुवर जी की... राम जी की आरती श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन,हरण भवभय दारुणम्। नव कंज लोचन, कंज मुख करकंज पद कंजारुणम्॥ श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन... कन्दर्प अगणित अमित छवि,नव नील नीरद सुन्दरम्। पट पीत मानहुं तड़ित रूचि-शुचिनौमि जनक सुतावरम्॥ श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन... भजु दीनबंधु दिनेशदानव दैत्य वंश निकन्दनम्। रघुनन्द आनन्द कन्द कौशलचन्द्र दशरथ नन्द्नम्॥ श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन... सिर मुकुट कुंडल तिलकचारू उदारु अंग विभूषणम्। आजानुभुज शर चाप-धर,संग्राम जित खरदूषणम्॥ श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन... इति वदति तुलसीदास,शंकर शेष मुनि मन रंजनम्। मम ह्रदय कंज निवास कुरु,कामादि खल दल गंजनम्॥ श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन... मन जाहि राचेऊ मिलहिसो वर सहज सुन्दर सांवरो। करुणा निधान सुजानशील सनेह जानत रावरो॥ श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन... एहि भाँति गौरी असीससुन सिय हित हिय हरषित अली। तुलसी भवानिहि पूजी पुनि-पुनिमुदित मन मन्दिर चली॥ श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन...

महावीर जयंती 2025 शुभकामनाएं: अपने प्रियजनों को भेजें ये सुंदर और प्रेरणादायक विशेज

Mahavir Jayanti 2025 Wishes in Hindi: महावीर जयंती Jain Religion Festival के सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण पर्वों में से एक है। यह पर्व जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर Lord Mahavir की जयंती के रूप में मनाया जाता है। Mahavir Jayanti 2025 Date की बात करें तो 2025 में यह पर्व 10 अप्रैल को मनाया जाएगा। इस दिन श्रद्धालु भगवान महावीर के जीवन, उपदेशों और Principles of Non-Violence (Ahimsa), Truth (Satya), Celibacy (Brahmacharya), Non-Possessiveness (Aparigraha) जैसे सिद्धांतों को याद करते हैं और उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लेते हैं। इस पावन अवसर पर लोग एक-दूसरे को Mahavir Jayanti Greetings in Hindi भेजते हैं। Lord Mahavir Teachings ने हमें सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। उनके उपदेश आज भी जीवन को शांत, संयमित और सफल बनाने का रास्ता दिखाते हैं। ऐसे में, जब आप अपने दोस्तों और परिवार को Happy Mahavir Jayanti Quotes भेजते हैं, तो यह न सिर्फ शुभकामनाएं होती हैं, बल्कि उनके जीवन में सकारात्मकता का संदेश भी बन जाती हैं। अगर आप भी अपने प्रियजनों को इस महावीर जयंती पर कुछ खास और दिल से भेजना चाहते हैं, तो यहां आपके लिए हैं Top 20 Mahavir Jayanti Wishes, जो आप WhatsApp, Facebook, Instagram Story या Status for Mahavir Jayanti के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। महावीर जयंती 2025 शुभकामना संदेश हिंदी में (Mahavir Jayanti Wishes in Hindi): 1. "अहिंसा का पाठ पढ़ाया, सत्य का मार्ग दिखाया, भगवान महावीर ने जीवन का सार सिखाया। महावीर जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं!" 2. "सत्य, अहिंसा और करुणा की प्रेरणा, भगवान महावीर का यही है मंत्र अद्वितीय। महावीर जयंती की मंगलकामनाएं।" 3. "जो सत्य और त्याग के पथ पर चले, महावीर वही जो सबका दुःख हर ले। Happy Mahavir Jayanti 2025!" 4. "अहिंसा परमो धर्मः, यही मंत्र अपनाओ हर कदम। भगवान महावीर की जयंती पर हार्दिक शुभकामनाएं!" 5. "महावीर के विचारों को अपनाएं, जीवन को सुंदर और शांत बनाएं। महावीर जयंती की शुभकामनाएं!" 6. "भगवान महावीर के सिद्धांतों पर चलें, अंदर की शांति और सच्चाई से मिलें। Mahavir Jayanti Mubarak Ho!" 7. "चलो अहिंसा का दीप जलाएं, महावीर स्वामी की शिक्षाओं को अपनाएं। महावीर जयंती की हार्दिक बधाई!" 8. "दया, करुणा और संयम की राह पर चलो, जीवन को सफल और सुखी बना लो। महावीर जयंती की मंगलकामनाएं।" 9. "सत्य और प्रेम का हो मार्गदर्शन, हर जीवन में हो शांति और अनुशासन। Mahavir Jayanti Wishes in Hindi!" 10. "बिना हिंसा के भी जीत होती है, ये भगवान महावीर ने दुनिया को सिखाया है। महावीर जयंती पर शांति और प्रेम की शुभकामनाएं।" महावीर जयंती व्हाट्सएप स्टेटस 2025 के लिए (Mahavir Jayanti WhatsApp Status in Hindi): 11. "सत्य अहिंसा का पाठ पढ़ाएं, हर दिल में करुणा जगाएं। Happy Mahavir Jayanti 2025!" 12. "अहिंसा का संदेश फैलाओ, महावीर की राह अपनाओ। महावीर जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं!" 13. "ना हो क्रोध, ना हो छल, बस हो शांति और सबका कल्याण। महावीर जयंती मुबारक हो!" 14. "भगवान महावीर की शिक्षाएं सदा अमर रहें, हम सभी का जीवन उज्ज्वल बनाएं।" 15. "जो अंदर जीत ले, वही सच्चा विजेता। महावीर ने हमें यही सिखाया है। शुभ महावीर जयंती!" 16. "संयम से जीवन जीना, यही है असली सफलता की कुंजी। महावीर जयंती पर यही सीख अपनाएं।" 17. "हर घर में हो अहिंसा की बात, हर मन में हो शांति की बात। महावीर जयंती की ढेरों शुभकामनाएं!" 18. "त्याग और तपस्या की प्रतिमूर्ति, भगवान महावीर को शत्-शत् नमन।" 19. "सभी को मिले शांति और संयम का आशीर्वाद, महावीर जयंती की बहुत-बहुत बधाई।" 20. "महावीर स्वामी की शिक्षाएं हैं अमूल्य धरोहर, चलो उनके पदचिन्हों पर चलकर जीवन बनाएं बेहतर।"

भगवान महावीर चालीसा : जय महावीर दया के सागर

Mahavir Chalisa in Hindi: Jain Dharma अनुसार Bhagwan Mahavir Jain Religion के 24वें Tirthankar हैं। वर्ष 2025 में Mahavir Jayanti 10 अप्रैल, Thursday को मनाई जाएगी। यह दिन Lord Mahavir Birth Anniversary की याद में मनाया जाता है। Mahavir Swami का मानना था कि हमें दूसरों के प्रति वहीं thoughts and behavior रखना चाहिए जो हम स्वयं के लिए पसंद करते हैं। Bhagwan Mahavir का Ghantakarna Mahavir Mool Mantra सबसे अधिक powerful mantra माना गया है। श्री महावीर चालीसा : Mahavir Chalisa दोहा : सिद्ध समूह नमों सदा, अरु सुमरूं अरहन्त। निर आकुल निर्वांच्छ हो, गए लोक के अंत ॥ मंगलमय मंगल करन, वर्धमान महावीर। तुम चिंतत चिंता मिटे, हरो सकल भव पीर ॥ चौपाई : जय महावीर दया के सागर, जय श्री सन्मति ज्ञान उजागर। शांत छवि मूरत अति प्यारी, वेष दिगम्बर के तुम धारी। कोटि भानु से अति छबि छाजे, देखत तिमिर पाप सब भाजे। महाबली अरि कर्म विदारे, जोधा मोह सुभट से मारे। काम क्रोध तजि छोड़ी माया, क्षण में मान कषाय भगाया। रागी नहीं नहीं तू द्वेषी, वीतराग तू हित उपदेशी। प्रभु तुम नाम जगत में सांचा, सुमरत भागत भूत पिशाचा। राक्षस यक्ष डाकिनी भागे, तुम चिंतत भय कोई न लागे। महा शूल को जो तन धारे, होवे रोग असाध्य निवारे। व्याल कराल होय फणधारी, विष को उगल क्रोध कर भारी। महाकाल सम करै डसन्ता, निर्विष करो आप भगवन्ता। महामत्त गज मद को झारै, भगै तुरत जब तुझे पुकारै। फार डाढ़ सिंहादिक आवै, ताको हे प्रभु तुही भगावै। होकर प्रबल अग्नि जो जारै, तुम प्रताप शीतलता धारै। शस्त्र धार अरि युद्ध लड़न्ता, तुम प्रसाद हो विजय तुरन्ता। पवन प्रचण्ड चलै झकझोरा, प्रभु तुम हरौ होय भय चोरा। झार खण्ड गिरि अटवी मांहीं, तुम बिनशरण तहां कोउ नांहीं। वज्रपात करि घन गरजावै, मूसलधार होय तड़कावै। होय अपुत्र दरिद्र संताना, सुमिरत होत कुबेर समाना। बंदीगृह में बँधी जंजीरा, कठ सुई अनि में सकल शरीरा। राजदण्ड करि शूल धरावै, ताहि सिंहासन तुही बिठावै। न्यायाधीश राजदरबारी, विजय करे होय कृपा तुम्हारी। जहर हलाहल दुष्ट पियन्ता, अमृत सम प्रभु करो तुरन्ता। चढ़े जहर, जीवादि डसन्ता, निर्विष क्षण में आप करन्ता। एक सहस वसु तुमरे नामा, जन्म लियो कुण्डलपुर धामा। सिद्धारथ नृप सुत कहलाए, त्रिशला मात उदर प्रगटाए। तुम जनमत भयो लोक अशोका, अनहद शब्दभयो तिहुँलोका। इन्द्र ने नेत्र सहस्र करि देखा, गिरी सुमेर कियो अभिषेखा। कामादिक तृष्णा संसारी, तज तुम भए बाल ब्रह्मचारी। अथिर जान जग अनित बिसारी, बालपने प्रभु दीक्षा धारी। शांत भाव धर कर्म विनाशे, तुरतहि केवल ज्ञान प्रकाशे। जड़-चेतन त्रय जग के सारे, हस्त रेखवत्‌ सम तू निहारे। लोक-अलोक द्रव्य षट जाना, द्वादशांग का रहस्य बखाना। पशु यज्ञों का मिटा कलेशा, दया धर्म देकर उपदेशा। अनेकांत अपरिग्रह द्वारा, सर्वप्राणि समभाव प्रचारा। पंचम काल विषै जिनराई, चांदनपुर प्रभुता प्रगटाई। क्षण में तोपनि बाढि-हटाई, भक्तन के तुम सदा सहाई। मूरख नर नहिं अक्षर ज्ञाता, सुमरत पंडित होय विख्याता। सोरठा : करे पाठ चालीस दिन नित चालीसहिं बार। खेवै धूप सुगन्ध पढ़, श्री महावीर अगार ॥ जनम दरिद्री होय अरु जिसके नहिं सन्तान। नाम वंश जग में चले होय कुबेर समान ॥